Shivsena History: करीब छह दशक के इतिहास में 6 बार टूट चुकी शिवसेना में उद्धव ठाकरे के कार्यकाल के दौरान यह चौथी बड़ी बगावत है, जिसके तहत अब उनके 9 में से 6 लोकसभा सांसदों ने अलग गुट बनाने की राह पकड़ ली है.

Shivsena History: महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी अस्मिता की आवाज बुलंद करने के लिए साल 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की नींव रखी थी. अपने करीब छह दशक के सफर में यह पार्टी अब तक छह बार बड़े बिखराव देख चुकी है. ताजा राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट के 9 में से 6 लोकसभा सांसदों ने पाला बदल लिया है. इन सांसदों ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट से हाथ मिला लिया है, जिससे पार्टी एक बार फिर दोफाड़ हो गई है. बालासाहेब ठाकरे की विरासत को आगे बढ़ा रहे उद्धव ठाकरे के लिए यह बहुत बड़ा व्यक्तिगत और राजनीतिक झटका माना जा रहा है. उनके अब तक के कार्यकाल में यह चौथी बार है जब पार्टी को इतने बड़े पैमाने पर आंतरिक बगावत का सामना करना पड़ा है.
अगर हम महाराष्ट्र के इस राजनीतिक सफर और शिवसेना के इतिहास को गहराई से समझना चाहें, तो वरिष्ठ पत्रकार और लेखक प्रकाश अकोलकर की मशहूर किताब ‘जय महाराष्ट्र: हा शिवसेना नावाचा इतिहास आहे’ में इसके शुरुआती दिनों का प्रामाणिक ब्यौरा मिलता है. इस किताब के ऐतिहासिक पन्नों के अनुसार, शिवसेना में बगावत का सिलसिला बहुत पुराना है. पार्टी बनने के कुछ ही समय बाद साल 1974 में इसके संस्थापक बाल ठाकरे और मुंबई के दिग्गज नेता बंदू शिंगरे के बीच मतभेद पैदा हो गए थे. उस वक्त मुंबई लोकसभा उपचुनाव में बाल ठाकरे ने कांग्रेस उम्मीदवार रामराव आदिक को समर्थन देने का फैसला किया था. मिल मजदूरों के बीच मजबूत पकड़ रखने वाले बंदू शिंगरे इस फैसले के सख्त खिलाफ थे. उन्होंने तुरंत पार्टी छोड़ दी और इसके समानांतर ‘प्रति शिवसेना’ नाम का नया संगठन खड़ा कर लिया था.
इसके बाद साल 1991 में शिवसेना को दूसरा सबसे बड़ा झटका लगा, जब छगन भुजबल ने बगावत का बिगुल फूंक दिया. उस समय विधानसभा चुनाव में शिवसेना के 52 विधायक जीतकर आए थे और भुजबल नेता प्रतिपक्ष का पद चाहते थे. जब बालासाहेब ने उनकी जगह मनोहर जोशी को यह जिम्मेदारी दी, तो भुजबल नाराज हो गए और 17 विधायकों के साथ पार्टी तोड़कर शरद पवार की कांग्रेस में शामिल हो गए. राजनीति का यह दौर थमा नहीं और साल 2004 में नारायण राणे ने उद्धव ठाकरे के बढ़ते कद और कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए शिवसेना को अलविदा कह दिया. राणे ने पहले ‘स्वाभिमान पार्टी’ बनाई और बाद में बीजेपी का दामन थाम लिया. ठीक इसके बाद साल 2006 में बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने भी पारिवारिक मतभेदों के चलते पार्टी छोड़ दी और ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ (MNS) का गठन किया.
शिवसेना के इतिहास का सबसे विनाशकारी मोड़ जून 2022 में आया, जब उद्धव ठाकरे के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार माने जाने वाले एकनाथ शिंदे ने तख्तापलट कर दिया. शिंदे के साथ शिवसेना के 40 विधायक और ज्यादातर सांसद चले गए, जिससे उद्धव ठाकरे के हाथ से सत्ता और पार्टी दोनों ही निकल गईं. यह कानूनी लड़ाई देश की सर्वोच्च अदालत और चुनाव आयोग तक पहुँची. अंततः चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को ही असली शिवसेना माना और पार्टी का आधिकारिक नाम व ‘तीर कमान’ का चुनाव चिन्ह उन्हें सौंप दिया. इस बड़े झटके के बाद उद्धव ठाकरे को मजबूरन अपनी नई पार्टी बनानी पड़ी, जिसे ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ या शिवसेना (UBT) नाम दिया गया और उन्हें नया चुनाव चिन्ह ‘मशाल’ मिला.
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की पार्टी ने शानदार वापसी करते हुए 9 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिससे कार्यकर्ताओं में नया जोश भर गया था. लेकिन राजनीति की हवा बदलते देर नहीं लगती और साल 2026 आते आते यह संजीवनी भी बेअसर दिखाई देने लगी. बुधवार को पार्टी के 9 में से 6 लोकसभा सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को एक पत्र सौंपकर अलग गुट बनाने की आधिकारिक मांग कर दी है. इन बागी सांसदों का झुकाव सीधे तौर पर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली मूल शिवसेना की तरफ देखा जा रहा है. महज चार साल के भीतर उद्धव ठाकरे के संगठन में यह दूसरी सबसे बड़ी टूट है. इस ताजा घटनाक्रम ने साबित कर दिया है कि शिवसेना की अंदरूनी खींचतान और बगावत की कहानी दशकों पुरानी है, जो आज भी थमने का नाम नहीं ले रही है.
