Shehbaz Sharif Troll: अमेरिका-ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते में खुद को बिचौलिया दिखाने और दस्तावेज पर दस्तखत करने के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के कदम को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकार उनकी घरेलू छवि सुधारने की एक बचकानी कोशिश मान रहे हैं.

Shehbaz Sharif Troll: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इन दिनों एक अजीब सा वाकया देखने को मिल रहा है. जब ईरान और अमेरिका के बीच एक बड़ा समझौता हुआ, तो इसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सबसे ज्यादा खुश नजर आए. वे इस पूरे मामले को भुनाने और अपने नाम की ब्रांडिंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. शहबाज शरीफ ने बकायदा एक औपचारिक समारोह रखकर ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (MoU) नामक दस्तावेज पर दस्तखत किए हैं. पाकिस्तान सरकार का दावा है कि उनके प्रधानमंत्री ने इस ऐतिहासिक शांति समझौते में एक मुख्य मध्यस्थ और गारंटर की भूमिका निभाई है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, इस मुख्य दस्तावेज पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने पहले ही हस्ताक्षर कर दिए थे.
अगर हम अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक समझौतों के इतिहास को समझना चाहें, तो मशहूर लेखक हेनरी किसिंजर की किताब ‘डिप्लोमेसी’ (Diplomacy) में इस तरह के प्रोटोकॉल का गहरा विश्लेषण मिलता है. इस किताब के सिद्धांतों के अनुसार, कोई भी देश किसी बड़े वैश्विक समझौते का हिस्सा तभी बनता है जब उसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतना गहरा प्रभाव हो. लेकिन इस मामले में पाकिस्तान की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है. कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान इस समय गहरे आर्थिक संकट, महंगाई और आईएमएफ (IMF) के कर्ज की किस्तों के बोझ तले दबा हुआ है. देश के भीतर भी शहबाज सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव है. ऐसे में अपनी गिरती हुई घरेलू छवि को सुधारने के लिए वे इस अंतरराष्ट्रीय मुद्दे का सहारा ले रहे हैं ताकि जनता का ध्यान भटकाया जा सके.
इस पूरे मामले में पाकिस्तान की असली चिंता सिर्फ पड़ोसी देश के प्रति उसका प्यार नहीं है. ईरान और पाकिस्तान आपस में एक लंबी सीमा साझा करते हैं, जिससे उनके क्षेत्रीय हित आपस में जुड़े हुए हैं. यदि अमेरिका और ईरान के बीच कड़वाहट कम होती है, तो पूरे मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा. पाकिस्तान को असल में यह डर सता रहा है कि इस नए बदलते समीकरण में कहीं वह बिल्कुल अकेला और हाशिये पर न चला जाए. इसी वजह से जब भी ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का कोई नया दौर शुरू होता है, तो पाकिस्तान किसी न किसी बहाने से खुद को उस चर्चा का हिस्सा बनाने की जिद करने लगता है. इसके लिए वह कभी मुस्लिम देशों की एकजुटता की बात करता है, तो कभी क्षेत्रीय शांति का राग अलापता है.
लेकिन हकीकत का पर्दा उठाया जाए, तो इस पूरी बातचीत की मुख्य मेज पर पाकिस्तान के लिए कोई कुर्सी आरक्षित ही नहीं थी. इस पूरी डील में पाकिस्तान का एकमात्र योगदान सिर्फ इतना था कि उसकी राजधानी इस्लामाबाद में कुछ घंटों के लिए एक शुरुआती बातचीत हुई थी. मज़ेदार बात यह है कि वह शुरुआती बातचीत भी पूरी तरह नाकाम साबित हुई थी. इसके बाद जिस जी-7 (G-7) सम्मेलन के बड़े मंच पर इस ऐतिहासिक डील को अंतिम रूप दिया गया, वहाँ पाकिस्तान को मेहमान के तौर पर आमंत्रित तक नहीं किया गया था. पहले यह तय हुआ था कि इस आखिरी समझौते पर स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में बैठकर आमने-सामने दस्तखत किए जाएंगे. मगर बाद में दोनों महाशक्तियों ने वर्चुअली (इंटरनेट के माध्यम से) ही इस डील को फाइनल कर दिया, जिसके बाद स्विट्जरलैंड का पूरा कार्यक्रम रद्द करना पड़ा.
वैश्विक राजनीति में खुद को हर जगह जरूरी दिखाने की पाकिस्तान की यह छटपटाहट काफी पुरानी है. अफगानिस्तान के संकट से लेकर खाड़ी देशों के मामलों तक, इस्लामाबाद हमेशा खुद को हर बड़े समीकरण का एक अहम हिस्सा साबित करने की नाकाम कोशिश करता आया है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का यह सीधा नियम है कि वैश्विक मंचों पर सम्मान सिर्फ बड़े-बड़े बयान देने से नहीं, बल्कि दुनिया पर अपना वास्तविक प्रभाव पैदा करने से मिलता है. ऐसे में बिना किसी वास्तविक प्रभाव के, दूसरे देशों की बड़ी डील के बीच में कूदकर कागजों पर दस्तखत करने के शहबाज शरीफ के इस कदम को दुनिया भर के राजनीतिक एक्सपर्ट बहुत ही बचकाना और मजाकिया मान रहे हैं.
