Why US Air Defense Failed in Saudi: सऊदी अरब के महंगे एयर डिफेंस सिस्टम को भेदकर हूती विद्रोही कैसे कर रहे हैं हमले? जानिए सस्ते ड्रोन्स और अमेरिकी हथियारों की इस जंग का पूरा सच.

Why US Air Defense Failed in Saudi: कल्पना कीजिए कि कोई सशस्त्र समूह ऐसे देश पर हमला कर रहा है, जिसके पास मिडिल ईस्ट की सबसे एडवांस सेनाओं और एयर डिफेंस सिस्टम में से एक मजबूत सुरक्षा कवच मौजूद है. यमन के कुछ हिस्सों पर कब्जा जमाने वाले हूती विद्रोहियों ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. इन विद्रोहियों ने सऊदी अरब के कड़े सुरक्षा घेरे को पूरी तरह भेद दिया और सीधे रियाद के बीचोंबीच बने इंटरनेशनल एयरपोर्ट को निशाना बनाया. इस हमले के बाद जेद्दा शहर में भी मिसाइल हमले को लेकर हाई अलर्ट जारी करना पड़ा, जहां सऊदी सरकार ने अपनी पहली थाड यूनिट तैनात की थी.
यमन की सीमा से दूर सऊदी के भीतर तक पहुंचे हमले
रियाद शहर हूती विद्रोहियों के मुख्य गढ़ सादा से लगभग नौ सौ दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. वहीं दूसरी तरफ जेद्दा शहर की दूरी भी लगभग सात सौ पंद्रह किलोमीटर दूर है. इस स्थिति को देखकर साफ पता चलता है कि अब यह लड़ाई सिर्फ सीमा तक सीमित रहने वाली छोटी-मझोली झड़प नहीं रह गई है. यह संघर्ष अब सीधे तौर पर सऊदी अरब की मुख्य धरती और उसके भीतर के इलाकों तक पहुंच चुका है. हाल ही में हुए इस खतरनाक हमले में कम से कम अठारह लोगों की जान चली गई और तीन सौ से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. सुरक्षा कारणों के चलते यह एयरपोर्ट कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया गया है.
अमेरिका के पैट्रियट और थाड सिस्टम भी क्यों चूके?
इस बड़े सवाल का जवाब खोजने के लिए विशेषज्ञों ने सऊदी अरब के उन इलाकों की गहराई से जांच की, जिन्हें निशाना बनाया गया था. जांच में सामने आया कि हूती विद्रोहियों के पास मौजूद हथियारों के तार सीधे तौर पर ईरान से जुड़े हुए हैं. गौर करने वाली बात यह है कि सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका से बेहद ताकतवर एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे हुए हैं. इन अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के नाम पैट्रियट और थाड हैं. इसके बावजूद हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब के अंदर तक घुसपैठ करने में कामयाब हो रहे हैं और रियाद के मुख्य एयरपोर्ट को बार-बार निशाना बना रहे हैं.
कम ऊंचाई और अलग रफ्तार वाले हथियारों का खतरनाक मिश्रण
हूती विद्रोहियों के पास हथियारों का एक बहुत बड़ा और खतरनाक जखीरा मौजूद है, जो इस चुनौती को और ज्यादा बढ़ा रहा है. उनके पास जुल्फिकार बैलिस्टिक मिसाइल, आसिफ और फालिक एंटी-शिप मिसाइलें, अल-मंदब क्रूज मिसाइल के साथ-साथ समद-तीन और शिहाब जैसे खतरनाक ड्रोन शामिल हैं. इन सभी हथियारों की उड़ान भरने का तरीका और उनकी रफ्तार एक-दूसरे से काफी अलग होती है. जब विद्रोही बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ इन छोटे ड्रोन्स का एक साथ इस्तेमाल करते हैं, तो बहुस्तरीय एयर डिफेंस व्यवस्था के लिए भी उन्हें हवा में रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है. कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन राडार की पकड़ से आसानी से बच जाते हैं.
करोड़ों के इंटरसेप्टर मिसाइल के सामने कुछ सौ डॉलर के ड्रोन
इस पूरी लड़ाई में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू दोनों पक्षों के हथियारों की लागत का बड़ा अंतर है. एक रिपोर्ट के अनुसार, पैट्रियट सिस्टम में इस्तेमाल होने वाली एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत दस लाख डॉलर से भी ज्यादा हो सकती है. इसके उलट हूती विद्रोहियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इन छोटे ड्रोन्स की कीमत महज कुछ सौ डॉलर ही होती है. यानी सऊदी अरब को दुश्मन के हर एक सस्ते हमले को रोकने के लिए लाखों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं. हमलावर बेहद कम लागत वाले ड्रोन से बार-बार हमला करते हैं, जबकि देश की रक्षा करने वाली मिसाइलें बहुत ज्यादा महंगी होती हैं.
एक चूक से बड़े नुकसान का खतरा और सुरक्षा की नई चुनौतियां
सऊदी अरब का एयर डिफेंस सिस्टम भले ही आने वाले अधिकांश हमलों को हवा में ही नाकाम करने में कामयाब हो जाता है, लेकिन अगर एक भी ड्रोन या मिसाइल सुरक्षा घेरे को पार कर जाए तो भारी तबाही मच सकती है. एयरपोर्ट या तेल के बड़े ठिकानों पर होने वाला एक भी सफल हमला देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता के लिए बहुत भारी पड़ सकता है. इस प्रकार की असंतुलित लड़ाई ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है. बेहद सस्ते हथियारों के जरिए होने वाले ये हमले साबित करते हैं कि केवल महंगे डिफेंस सिस्टम ही पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकते हैं.
