middle east crisis strait of hormuz impact in india: होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण भारत की 90% एलपीजी सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे शहरों में सिलेंडरों की किल्लत हो गई है. भारत के पास एलपीजी का भंडार 2 दिन से भी कम का है, जबकि कच्चे तेल के सुरक्षित स्टॉक के कारण पेट्रोल-डीजल की स्थिति फिलहाल सामान्य है.

middle east crisis strait of hormuz impact in india: मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव का असर अब भारत तक पहुंचने लगा है. खास तौर पर रसोई गैस यानी एलपीजी की सप्लाई पर दबाव साफ दिखाई दे रहा है. कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें लग गई हैं. लोगों को सिलेंडर भरवाने के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है. कुछ जगहों पर रेस्टोरेंट और ढाबों को भी काम रोकना पड़ा है. ऐसे हालात देखकर लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर यह संकट अचानक क्यों पैदा हो गया. क्या इसकी वजह सिर्फ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना है या इसके पीछे और भी कारण हैं.
दरअसल, यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है. दुनिया की करीब 20 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुजरती है. खाड़ी के कई बड़े तेल और गैस उत्पादक देश इसी मार्ग के जरिए अपने उत्पाद दुनिया तक भेजते हैं. भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से मंगाता है. एलपीजी, एलएनजी और कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से भारत पहुंचता है. अनुमान है कि भारत आने वाली एलपीजी की लगभग 80 से 90 प्रतिशत खेप इसी रास्ते से होकर गुजरती है. जब इस मार्ग पर तनाव बढ़ा और जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई, तो इसका असर सबसे पहले एलपीजी की सप्लाई पर दिखा.
9 मार्च के बाद से कई शहरों में एलपीजी को लेकर घबराहट बढ़ने लगी. लोगों ने डर के कारण जल्दी-जल्दी गैस सिलेंडर बुक करना शुरू कर दिया. कुछ जगहों पर गैस स्टेशनों के बाहर भीड़ लग गई. हालांकि पेट्रोल और डीजल पंपों पर ऐसी स्थिति बहुत कम देखने को मिली. सरकार का कहना है कि पेट्रोलियम ईंधन की आपूर्ति पर्याप्त है. रिफाइनरियां लगातार कच्चे तेल को प्रोसेस करके पेट्रोल और डीजल तैयार कर रही हैं. इसलिए फिलहाल इन ईंधनों की उपलब्धता सामान्य बनी हुई है.
सरकार का कहना है कि घरेलू एलपीजी की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा रही है. अचानक बढ़ी मांग और लोगों की घबराहट की वजह से स्थिति थोड़ी बिगड़ गई. कई जगह सिलेंडर वितरण में देरी हुई और कुछ स्थानों पर काला बाजार भी शुरू हो गया. इसी कारण कुछ रेस्टोरेंट और ढाबों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा. प्रशासन ने कमर्शियल सिलेंडरों की बिक्री पर रोक लगाकर घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देना शुरू किया है. इससे आम घरों तक गैस पहुंचाने की कोशिश की जा रही है.
भारत में एलपीजी की खपत बहुत ज्यादा है. देश हर साल 31 मिलियन टन से अधिक एलपीजी इस्तेमाल करता है. लेकिन घरेलू उत्पादन इस मांग का आधा भी पूरा नहीं कर पाता. बाकी जरूरत आयात के जरिए पूरी की जाती है. सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे खाड़ी देश इसके प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं. यही वजह है कि भारत आने वाली एलपीजी के टैंकरों को खाड़ी क्षेत्र से निकलकर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना पड़ता है. इस मार्ग पर किसी भी तरह की रुकावट तुरंत सप्लाई चेन पर असर डालती है.
पेट्रोल और डीजल के मामले में स्थिति थोड़ी अलग है. भारत कच्चा तेल 40 से अधिक देशों से आयात करता है. हाल के वर्षों में रूस सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है. इसके बाद इराक और सऊदी अरब का स्थान आता है. रूस से आने वाला कच्चा तेल अक्सर ऐसे समुद्री रास्तों से आता है जो होर्मुज से होकर नहीं गुजरते. केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरिदीप सिंह पूरी ने भी कहा है कि भारत के लगभग 70 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात अब ऐसे स्रोतों से हो रहा है जो होर्मुज के बाहर हैं. इसलिए पेट्रोल और डीजल पर तुरंत असर नहीं पड़ा.
एक और कारण यह है कि भारत के पास कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार मौजूद है. देश में विशाखापत्तनम, मंगलौर और पादुर में बड़े भूमिगत भंडारण केंद्र बनाए गए हैं. इन स्थानों पर आपातकालीन स्थिति के लिए कच्चा तेल जमा रखा जाता है. इसके अलावा तेल कंपनियों के पास भी कमर्शियल स्टॉक मौजूद रहता है. इन भंडारों की मदद से कई हफ्तों तक देश की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं. यही कारण है कि पेट्रोल और डीजल की सप्लाई तुरंत प्रभावित नहीं होती.
एलपीजी के मामले में सबसे बड़ी समस्या भंडारण की कमी है. भारत में एलपीजी के बड़े रणनीतिक भंडार नहीं हैं. उपलब्ध स्टोरेज क्षमता बहुत सीमित है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार देश में एलपीजी का कुल भंडार लगभग 1.4 लाख टन के आसपास है. यह मात्रा देश की दो दिन की जरूरत से भी कम है. इसका मतलब यह है कि अगर सप्लाई कुछ दिन भी रुक जाए, तो बाजार में तुरंत दबाव बढ़ने लगता है.
पिछले दस वर्षों में एलपीजी की मांग भी तेजी से बढ़ी है. इसकी एक बड़ी वजह Pradhan Mantri Ujjwala Yojana है. इस योजना के तहत लाखों गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए. इससे देशभर में एलपीजी कनेक्शनों की संख्या तेजी से बढ़ गई. 2010 के आसपास जहां करीब 10 करोड़ कनेक्शन थे, वहीं अब यह संख्या 33 करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है. लकड़ी और बायोमास से गैस की ओर यह बदलाव स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, लेकिन इससे एलपीजी पर निर्भरता भी काफी बढ़ गई है.
इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार और तेल कंपनियां कई कदम उठा रही हैं. रिफाइनरियों को निर्देश दिया गया है कि कच्चे तेल से एलपीजी की अधिकतम मात्रा निकालने की कोशिश करें. कुछ पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक को अस्थायी रूप से गैस उत्पादन के लिए डायवर्ट किया जा रहा है. इसके अलावा खाड़ी देशों के बाहर से भी अतिरिक्त एलपीजी खरीदने की कोशिश हो रही है. हालांकि उन खेपों को भारत पहुंचने में ज्यादा समय लग सकता है और लागत भी अधिक हो सकती है.
कुल मिलाकर यह संकट दिखाता है कि वैश्विक राजनीति और समुद्री मार्गों में होने वाले बदलाव का असर कितनी जल्दी आम लोगों की जिंदगी तक पहुंच जाता है. होर्मुज में तनाव बढ़ा और उसका असर सीधे भारतीय रसोई तक दिखाई देने लगा. फिलहाल पेट्रोल और डीजल की स्थिति सामान्य है. लेकिन एलपीजी की सप्लाई पर दबाव इसलिए ज्यादा पड़ा क्योंकि इसका आयात सीमित क्षेत्रों से होता है और देश में इसका भंडार भी बहुत कम है. यही वजह है कि होर्मुज में हलचल का असर सबसे पहले गैस सिलेंडरों की लाइन में खड़े लोगों पर दिखाई दिया.
