पंजाब चुनाव सर पर है और अरविंद केजरीवाल ने ये ऐलान कर दिया है कि, मैं इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं हूं, तो ऐसे में अरविंद केजरीवाल का साथ इंडिया गठबंधन की कोई भी पार्टी नहीं देगी, ना कांग्रेस देगी, ना टीएमसी देगी, ना डीएमके देगी, कोई भी पार्टी आम आदमी पार्टी का साथ पंजाब में नहीं देगी, अब आम आदमी पार्टी पंजाब में बिल्कुल अलग-थलग पड़ गई है। आम आदमी पार्टी के पास एक ही राज्य बचा है अपना पॉलिटिकल अस्तित्व बचाने के लिए और वो है पंजाब, दिल्ली की कुर्सी तो पहले ही हाथ से जा चुकी है, पंजाब बचा है, लेकिन अब पंजाब के पीछे हाथ धोकर पड़ गई है, बीजेपी और आरएसएस। आइए समझते हैं पूरा सियासी गणित। द ट्रुथ 24 की रिपोर्ट में…..

BJP-RSS के लिए सम्मान की लड़ाई है पंजाब
बीजेपी और आरएसएस ने बंगाल की तरह पंजाब को अब अपने सम्मान की लड़ाई बना लिया है और बीजेपी से ज्यादा आरएसएस ने बना लिया है। अमित शाह खुद नशा मुक्ति अभियान वहां पर चला रहे हैं। क्योंकि सबसे बड़ा इश्यू वहां पर नशा का ही है, जो पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए, पाकिस्तान से अवैध तरीके से बॉर्डर से पंजाब में आता है, तो अब पंजाब में नशा मुक्ति अभियान की शुरुआत करते हुए आम आदमी पार्टी के पीछे पूरी की पूरी एनडीए पड़ गई है, बीजेपी के साथ जितने भी दल हैं वो और आरएसएस सब आम आदमी पार्टी के पीछे पड़ गए हैं।
पंजाब में RSS का ग्राउंड प्लान
आरएसएस जमीनी स्तर पर पंजाब में बेहद आक्रामक तरीके से काम कर रही है, पिछले 2 साल में संघ ने पंजाब में अपनी शाखाओं की संख्या दोगुनी कर दी है। गांव-गांव शाखा लगा रही है, खासकर बॉर्डर के जिलों
अमृतसर, तरनतारन, गुरदासपुर, फिरोजपुर में संघ का फोकस सबसे ज्यादा है,
पंजाब में RSS की रणनीति तीन लेवल पर है…
पहला- सेवा कार्य: नशा मुक्ति केंद्र, मुफ्त डिस्पेंसरी, कोचिंग क्लासेस चला रही है। एकल विद्यालय के जरिए दूर-दराज के गांवों में पहुंच बनाई है।
दूसरा- सामाजिक समरसता: दलित-सिख समुदाय को जोड़ने के लिए समरसता बैठकें हो रही हैं। गुरु रविदास जयंती, वाल्मीकि जयंती पर बड़े कार्यक्रम कराए जा रहे हैं।
तीसरा- राष्ट्रवाद का नैरेटिव: बॉर्डर सिक्योरिटी, पाकिस्तान से ड्रोन, खालिस्तान समर्थक गतिविधियों के खिलाफ RSS लगातार लोगों को जागरूक कर रही है।
मेरा गांव, मेरा देश अभियान के तहत युवाओं को जोड़ा जा रहा है। संघ के प्रचारक घर-घर जाकर नशे के खिलाफ और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं।
RSS कैसे बना रही BJP के लिए जमीन?
RSS का सीधा पॉलिटिकल काम नहीं है, लेकिन पंजाब में वो BJP की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। संघ के स्वयंसेवक बूथ लेवल पर ‘पन्ना प्रमुख’ का काम कर रहे हैं, हर 30-40 वोटर पर एक कार्यकर्ता तैनात है, वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन से लेकर लोगों को बूथ तक लाने तक की जिम्मेदारी संघ ने उठाई है, नशा मुक्ति अभियान को RSS ने सामाजिक आंदोलन बना दिया है। रैलियों के लिए भीड़ जुटाने से लेकर गांवों में चौपाल लगाने तक का काम संघ के लोग कर रहे हैं, बीजेपी के पास पंजाब में बड़ा कैडर नहीं था, उस गैप को RSS भर रही है, खास बात ये है कि RSS सिख परंपराओं का सम्मान करते हुए काम कर रही है। गुरुद्वारों में लंगर सेवा, गुरुओं के इतिहास पर सेमिनार, और ‘सिख-पंजाबी-हिंदुस्तानी’ के नैरेटिव को मजबूत किया जा रहा है। इससे BJP की ‘हिंदू पार्टी’ वाली इमेज भी बदली है।
आप के ऊपर लटकी है तलवार
अब क्या अरविंद केजरीवाल अपने दम पर अपनी पार्टी को पंजाब में बचा पाएंगे? क्या फिर से पंजाब में 2022 वाला खेल कर पाएंगे? पंजाब के 2022 विधानसभा चुनाव में 117 में 92 सीटें जीती थीं AAP ने और अभी हाल ही में हुए निकाय चुनावों में भी शानदार प्रदर्शन किया है, बावजूद इसके आम आदमी पार्टी के ऊपर तलवार तो लटकी हुई है। आम आदमी पार्टी के लिए अपना पॉलिटिकल अस्तित्व बनाए रखने के लिए पंजाब जीतना जीने-मरने जैसा है। अगर आप पंजाब जीत गई तो जिंदा रहेगी और पंजाब हार गई तो मर जाएगी, लेकिन 2022 और 2026 में फर्क है। तब लहर थी, अब एंटी-इनकंबेंसी है। तब राघव चड्ढा जैसे नेता जमीन पर थे, अब वो बीजेपी में चले गए हैं। दिल्ली की सत्ता भी हाथ से निकल चुकी है। अरविंद केजरीवाल खुद कमजोर पड़ गए हैं।
कांग्रेस का संगठन मजबूत, AAP पर टूट पड़ेगी
अब तो कांग्रेस भी पंजाब में मजबूती से चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस भी आम आदमी पार्टी के पीछे हाथ धोकर पड़ जाएगी। कांग्रेस भी सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। कांग्रेस भी अपने INDIA गठबंधन के सहयोगियों के साथ आम आदमी पार्टी के खिलाफ चुनाव में उतरेगी, पंजाब उन राज्यों में है जहां कांग्रेस का संगठन बहुत मजबूत है। पिछले चुनावों में एंटी-इनकंबेंसी थी और आप का संगठन जमीनी स्तर पर पंजाब में लग गया था। राघव चड्ढा ने पंजाब में AAP के लिए बहुत संघर्ष किया था, लेकिन इस बार राघव चड्ढा बीजेपी में चले गए हैं। आम आदमी पार्टी के हाथ से दिल्ली की कुर्सी भी छिन चुकी है, अब संगठन पहले की तरह मजबूत नहीं रह गया है। कांग्रेस का संगठन पंजाब में आम आदमी पार्टी से ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है….
AAP-कांग्रेस की लड़ाई का फायदा उठाएगी BJP
इस चुनाव की बात करें तो आप और कांग्रेस की लड़ाई का सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा, ये तय है। 2022 में कांग्रेस और अकाली दल के वोट बंटे थे, AAP को वॉकओवर मिला था। इस बार कांग्रेस पूरी ताकत से लड़ेगी।बीजेपी भी नशा, बॉर्डर सिक्योरिटी और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर आक्रामक है। आरएसएस का ग्राउंड नेटवर्क, अमित शाह का नशा मुक्ति कैंपेन, और मोदी का चेहरा- बीजेपी पंजाब में अब सिर्फ लड़ने नहीं, जीतने उतरी है। अकाली दल भी मैदान में है। चतुष्कोणीय मुकाबले में वोट बंटेगा जिसका नुकसान सीधे AAP को होगा।
तो कुल मिलाकर पंजाब में AAP की लड़ाई अस्तित्व की लड़ाई बन गई है। INDIA गठबंधन से अलग होने के बाद केजरीवाल अकेले पड़ गए हैं। कांग्रेस बदला लेने के मूड में है। BJP-RSS ने पंजाब को प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है, 2022 में 92 सीटें जीतने वाली AAP के पास अब खोने को सब कुछ है। राघव चड्ढा जैसे रणनीतिकार अब BJP में हैं। संगठन कमजोर है। वहीं RSS गांव-गांव शाखा लगाकर, नशा मुक्ति और सेवा कार्यों से BJP के लिए जमीन तैयार कर रही है। बॉर्डर के मुद्दे पर राष्ट्रवाद का नैरेटिव सेट किया जा रहा है, अब देखना ये है कि क्या केजरीवाल अकेले दम पर अपना आखिरी किला बचा पाएंगे, या RSS के ग्राउंड नेटवर्क और BJP के आक्रामक कैंपेन के सामने पंजाब में भी AAP का ‘झाड़ू’ साफ हो जाएगा। इतना तय है- इस बार 2022 वाला वॉकओवर नहीं मिलने वाला।
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