Iran peace agreement: ये खबर अमेरिकी सरकार और खुफिया एजेंसी सीआईए के अंदर ईरान परमाणु समझौते को लेकर पैदा हुए गहरे मतभेद और ईरान की नीयत पर उठ रहे गंभीर सवालों के बारे में बताने का काम करता है.
Iran peace agreement: ईरान के साथ हुए नए समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने ही घर में घिर गए हैं. इस डील की वजह से खुद ट्रंप की टीम के अंदर दो फाड़ हो चुके हैं. सीआईए समेत अमेरिका की कई बड़ी खुफिया एजेंसियों और प्रशासन के दिग्गजों को इस समझौते पर गहरा शक है. विरोध करने वाले अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप ने ईरान को जरूरत से ज्यादा रियायतें दे दी हैं. बड़ी बात यह है कि ट्रंप खुद अपने विरोधी बराक ओबामा पर साल 2015 की ईरान डील को लेकर यही आरोप लगाते थे. अब इतिहास खुद को दोहरा रहा है और ट्रंप की टीम इस एमओयू के सपोर्ट और विरोध में पूरी तरह बंट गई है. जहां एक तरफ जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर इस डील के पक्ष में खड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ इसके सख्त खिलाफ हैं.
खुफिया एजेंसी सीआईए ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि अमेरिका को ईरान से एक बार फिर बड़ा धोखा मिल सकता है. सीआईए के डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ ने सीधे राष्ट्रपति ट्रंप को बताया है कि उनके पास ऐसे पुख्ता सबूत हैं जो ईरान की नीयत पर शक पैदा करते हैं. खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक ईरान अंतिम समझौते में परमाणु कार्यक्रम को रोकने की अमेरिकी शर्तों को शायद ही मानेगा. सीआईए का मानना है कि ईरान परमाणु बम न बनाने के वादे से कभी भी पलट सकता है. इस डील की घोषणा होने से पहले व्हाइट हाउस में कई उच्च स्तरीय बैठकें हुई थीं. इन सीक्रेट मीटिंग्स में खुफिया इनपुट साझा किए गए, जिससे पता चला कि ईरानी अधिकारी आपस में तो कुछ और ही योजना बना रहे हैं, जबकि अमेरिका और मध्यस्थों के सामने उनका रुख बिल्कुल अलग है.
इन गंभीर चर्चाओं के बीच विदेश मंत्री मार्को रुबियो और सीआईए प्रमुख ने खुलकर ट्रंप के सामने अपनी आपत्तियां रखीं. उन्होंने साफ कहा कि खुफिया इनपुट को देखते हुए ईरान के इरादों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं किया जा सकता है. हालांकि इस खींचतान पर व्हाइट हाउस के एक बड़े अधिकारी ने सफाई दी है. उनका कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप हमेशा फैसला लेने से पहले अपनी टीम में सबकी राय सुनते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय उन्हीं का होता है. व्हाइट हाउस के मुताबिक यह समझौता प्रशासन के उन सभी लक्ष्यों को पूरा करता है जो ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकते हैं. इस डील के जरिए ईरान को अपना ज्यादा समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) नष्ट करना होगा और वह दुनिया की ऊर्जा सप्लाई को भी बाधित नहीं कर पाएगा.
डील को आगे बढ़ाने के लिए जेडी वेंस की अगुवाई में अमेरिकी टीम इसी शुक्रवार को ईरान की संसद के स्पीकर और विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात करेगी. इस बातचीत में पाकिस्तान और कतर के मध्यस्थ भी शामिल होने वाले हैं. हालांकि 14 पॉइंट्स वाले इस शुरुआती समझौते की पूरी कॉपी अभी दुनिया के सामने नहीं आई है. लेकिन सूत्रों का कहना है कि इस एमओयू में ईरान को खोने के लिए कम और पाने के लिए बहुत कुछ है. समझौते के तहत जब तक अंतिम बातचीत चलेगी, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ाएगा. अगर फाइनल डील कामयाब रहती है, तो अमेरिका 30 दिनों के भीतर अपनी सेना को पीछे हटा लेगा और ईरान पर लगे प्रतिबंधों को धीरे धीरे पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा.
अमेरिकी अधिकारियों ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘काम के बदले भुगतान’ यानी परफॉर्मेंस मॉडल का नाम दिया है. इसका मतलब यह है कि अगर ईरान परमाणु नियमों का सही से पालन करेगा, तभी अमेरिका उसके फ्रीज किए गए फंड को रिलीज करेगा. एक सीनियर अमेरिकी अधिकारी का कहना है कि अगले दो से तीन हफ्तों के भीतर यह पूरी तरह साफ हो जाएगा कि ईरान परमाणु समझौते को लेकर कितना गंभीर है. अगर ईरान ने अपनी चालाकी दिखाने की कोशिश की, तो अमेरिका इस बातचीत को तुरंत वहीं पर रोक देगा. अब पूरी दुनिया की नजरें इसी शुक्रवार को होने वाली बैठक पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप अपनी ही टीम के विरोध के बावजूद ईरान के साथ इस ऐतिहासिक समझौते को अमली जामा पहना पाते हैं या नहीं.

