इस देश में जो मजारें आपको दिखाई दे रही हैं, जो मस्जिदें आपको दिखाई दे रही हैं… आप कहते होंगे कि ये डीडीए की जमीन पर है, आप कहते होंगे कि ये एमसीडी की जमीन पर है, आप कहते होंगे कि ये जंगल की जमीन पर है, आप कहते होंगे कि ये नदी की जमीन पर है, आप कहते होंगे कि ये स्कूल की जमीन पर है, आप कहते होंगे कि ये सरकारी जमीन पर है, आप कहते होंगे कि ये अतिक्रमण हैं। तो ये क्यों है? सरकार असल में इसे हटाना तो चाह रही है लेकिन हटा क्यों नहीं पा रही है? क्यों नहीं सरकार ऐसे ड्राइव चला रही जिससे 24 घंटे के अंदर जितनी भी अवैध मजारें हैं, जितनी भी अवैध मस्जिदें हैं, सबको रातों-रात साफकर दे? क्या सरकार कमजोर है या सरकार किसी विशेष वर्ग से डरती है? क्या ऐसा करने से दंगा हो सकता है? या ऐसा क्या बात है, क्या मामला है? तो हम आपको इसका कानूनी पक्ष समझाते हैं, जो अभी तक किसी मीडिया ने दिखाया नहीं, ना किसी चैनल वालों ने समझाया। द ट्रुथ 24 आपको परत दर परत बताएगा कि आखिर ये है क्या। तो चलिए सबसे पहले बात करते हैं वक्फ़ बोर्ड क्या है और भारत में उसके पास कितनी जमीनें हैं।
वक्फ़ बोर्ड क्या है?
वक्फ़ को आसान भाषा में समझें तो जब कोई मुस्लिम अपनी जमीन, दुकान, मकान या दूसरी संपत्ति अल्लाह के नाम पर समाज और धार्मिक कामों के लिए हमेशा के लिए दान कर देता है, तो उसे वक्फ़ कहा जाता है। एक बार कोई संपत्ति वक्फ़ हो गई तो उसे बेचा नहीं जा सकता और न ही वापस लिया जा सकता है। उस संपत्ति से जो आमदनी होती है, उसका इस्तेमाल मस्जिद, मदरसा, कब्रिस्तान, अनाथालय या गरीब लोगों की मदद जैसे कामों में किया जाता है, इन संपत्तियों की देखरेख और प्रबंधन के लिए हर राज्य में वक्फ़ बोर्ड बनाया गया है। वक्फ़ बोर्ड का काम यह देखना होता है कि वक्फ़ की जमीन और संपत्तियों का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं और उन पर कोई अवैध कब्जा तो नहीं है, अगर संपत्तियों की बात करें तो वक्फ़ बोर्ड देश के सबसे बड़े भूमि मालिकों में गिना जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देशभर में वक्फ़ बोर्ड के पास करीब 8 से 9 लाख संपत्तियां दर्ज हैं और इनसे जुड़ी जमीन लगभग 9 लाख एकड़ से ज्यादा बताई जाती है। अनुमान है कि इन संपत्तियों की बाजार कीमत इस समय अरबों रुपये है।
वक्फ़ कानून क्या है?
भारत में वक्फ़ संपत्तियों को चलाने और उनकी निगरानी के लिए *वक्फ़ एक्ट 1995* बनाया गया था। 2013 में इसमें कुछ संशोधन भी हुए। इस कानून के तहत वक्फ़ बोर्ड को संपत्तियों का रिकॉर्ड रखने, उनकी सुरक्षा करने और विवाद होने पर कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है। वक्फ़ बोर्ड का अपना ट्रिब्यूनल होता है, जहां वक्फ़ संपत्ति से जुड़े विवाद सुने जाते हैं।
वक्फ़ कानून और दुरुपयोग के आरोप
पिछले कुछ सालों में वक्फ़ कानून काफी चर्चा में रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि वक्फ़ बोर्ड को जरूरत से ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं, जबकि इसके समर्थकों का कहना है कि अगर ये कानून नहीं होगा तो वक्फ़ की संपत्तियों पर कब्जे बढ़ जाएंगे और उनका सही इस्तेमाल नहीं हो पाएगा।
विवाद का मुख्य कारण क्या है?
वक्फ़ एक्ट 1995 की धारा 40 के तहत वक्फ़ बोर्ड को यह अधिकार है कि, वह किसी भी संपत्ति को वक्फ़ संपत्ति होने का संदेह होने पर उसकी जांच कर सकता है और उसे वक्फ़ संपत्ति घोषित कर सकता है। अगर बोर्ड किसी जमीन को वक्फ़ संपत्ति घोषित कर दे, तो उस पर आपत्ति करने वाले को वक्फ़ ट्रिब्यूनल में ही जाना पड़ता है। इसी प्रावधान को लेकर विवाद है।
दुरुपयोग के आरोप कैसे लगते हैं?
इसी कानून के संदर्भ में कई बार यह आरोप लगते हैं कि कुछ जगहों पर सरकारी जमीन, ग्राम समाज की जमीन, या सार्वजनिक उपयोग की जमीन को भी वक्फ़ संपत्ति घोषित करने का दावा कर दिया जाता है।
सड़क किनारे अतिक्रमण
कई बार सड़कों के किनारे या चौराहों पर मजार बन जाती हैं। आरोप लगता है कि बाद में उस जगह को वक्फ़ संपत्ति बताकर हटाने में कानूनी अड़चन आती है।
रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण
देश के कई हिस्सों में रेलवे लाइन के किनारे या रेलवे की जमीन पर बनी मस्जिद या मजार को लेकर विवाद सामने आए हैं। रेलवे कई बार ऐसी संरचनाओं को अवैध अतिक्रमण बताता है, जबकि दूसरी तरफ से उसे वक्फ़ संपत्ति होने का दावा किया जाता है।
वन विभाग की जमीन पर अतिक्रमण
जंगल की जमीन या वन विभाग की जमीन पर भी मजार या धार्मिक ढांचे बनने और बाद में उन्हें वक्फ़ संपत्ति बताने के आरोप लगते रहे हैं।
निजी संपत्ति पर दावा
कई बार निजी लोगों की जमीन पर भी वक्फ़ बोर्ड द्वारा संपत्ति होने का नोटिस भेजे जाने के मामले सामने आए हैं। तमिलनाडु के तिरुचेंदुरै गांव का मामला इसमें चर्चित रहा, जहां पूरे गांव को वक्फ़ संपत्ति बताने का दावा किया गया था, यानी सीधी भाषा में कहें तो वक्फ़ बोर्ड एक ऐसी संस्था है जो मुस्लिम समाज द्वारा दान की गई संपत्तियों की देखरेख करती है। इसके पास देशभर में लाखों संपत्तियां हैं और वक्फ़ कानून यह तय करता है कि इन संपत्तियों का प्रबंधन और इस्तेमाल किस तरह होगा, लेकिन इसी कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर विवाद है। एक पक्ष इसे वक्फ़ संपत्तियों की सुरक्षा के लिए जरूरी मानता है, तो दूसरा पक्ष इसे एकतरफा और दुरुपयोग की बात करता है, इसी वजह से केंद्र सरकार वक्फ़ कानून में संशोधन का विधेयक भी लाई है, जिस पर संसद में बहस चल रही है।
सरकार वक्फ़ बोर्ड में क्यों चाहती है बदलाव
इसके पीछे 3 बड़ी वजहें बताई जा रही हैं…
बोर्ड के पास ज्यादा पावर
1995 के वक्फ़ कानून की धारा 40 से बोर्ड को बहुत ज्यादा ताकत मिल गई है। आरोप ये है कि बोर्ड को अगर शक हो जाए कि कोई जमीन वक्फ़ की है, तो वो खुद जांच करके उसे वक्फ़ घोषित कर सकता है। इसी वजह से कई बार प्राइवेट लोगों की जमीन, गांव की जमीन, या सरकारी जमीन पर भी वक्फ़ का दावा ठोक दिया जाता है। रेलवे की जमीन पर मस्जिद, जंगल की जमीन पर मजार, सड़क किनारे दरगाह… ऐसे केस इसी वजह से होते हैं।
हिसाब-किताब साफ नहीं
वक्फ़ के पास 8-9 लाख संपत्तियां हैं, लेकिन उनका ठीक से डिजिटल रिकॉर्ड नहीं है। बहुत सी जमीनों पर कब्जे हैं, या किराया इतना कम है कि गरीब मुसलमानों को फायदा ही नहीं मिलता। इसलिए सिस्टम बदलना जरूरी है।
कोर्ट जाना मुश्किल
अभी अगर वक्फ़ ट्रिब्यूनल का फैसला गलत लगे, तो सीधे सिविल कोर्ट नहीं जा सकते, इसके लिए आप सिर्फ हाईकोर्ट जा सकते हैं। आम आदमी के लिए ये लंबा और काफी महंगा पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है मामला
वक्फ़ संशोधन विधेयक 2024 अभी संसद में है और इस पर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दाखिल हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने मौजूदा स्थिति बनाए रखने को कहा है। यानी जब तक कानून में बदलाव नहीं हो जाता और नया फ्रेमवर्क नहीं बनता, तब तक वक्फ़ बोर्ड की दर्ज संपत्तियों पर यथास्थिति बनी रहेगी। इसलिए सरकार चाहकर भी वक्फ़ रिकॉर्ड में दर्ज किसी मजार या मस्जिद पर सीधी कार्रवाई नहीं कर पा रही है, चाहे वह कानूनी हो या अतिक्रमण में बनी हो, यानी मामला फिलहाल कानूनी प्रक्रिया में फंसा है। सरकार बिल के जरिए वक्फ़ बोर्ड के पावर, उसका ढांचा और जमीनों के सर्वे की प्रक्रिया बदलना चाहती है।
