Himalayan Water Bomb: नेपाल 18000 फीट की ऊंचाई पर मौजूद 4 खतरनाक ग्लेशियर झीलों को खाली करने का 415 करोड़ का मिशन शुरू कर रहा है. इससे बिहार और यूपी में तबाही टलेगी और भारत को 3 बड़े फायदे होंगे.

Himalayan Water Bomb: नेपाल में हाल ही में आई ग्लेशियर तबाही ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था. इस प्राकृतिक त्रासदी के घाव अभी भरे भी नहीं हैं कि हिमालय में कई और ‘वॉटर बम’ फटने को तैयार बैठे हैं. इन खतरों से निपटने के लिए नेपाल सरकार एक बेहद ही साहसिक कदम उठाने जा रही है. नेपाल 18,000 फीट की खौफनाक ऊंचाई पर स्थित 4 खतरनाक झीलों के पानी को खाली करने का मास्टरप्लान बना चुका है. इस हाई-रिस्क प्रोजेक्ट पर करीब 415 करोड़ रुपये की लागत आएगी. 6 साल तक चलने वाले इस खतरनाक मिशन से नेपाल ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश भारत को भी 3 बड़े सुरक्षा फायदे मिलने वाले हैं. आइए जानते हैं नेपाल के इस साहसिक मिशन की पूरी कहानी.
18000 फीट की ऊंचाई पर ‘मौत से मुकाबला’ और 415 करोड़ का बजट
यह महा-मिशन मध्य और पूर्वी नेपाल की चार बेहद दुर्गम बर्फीली झीलों पर चलाया जाएगा. इनके नाम ठुलागी, लोअर बारुण, लुमडिंग त्शो और होंगू II हैं. ये झीलें समुद्र तल से 13,280 फीट से लेकर 18,000 फीट तक की जानलेवा ऊंचाई पर स्थित हैं. इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम होता है और हर पल एवलांच का खतरा बना रहता है. वैज्ञानिकों ने इन्हें नेपाल के सिर पर मंडराता सबसे बड़ा कुदरती खतरा घोषित किया है. इस 6 साल लंबे मिशन के लिए 415 करोड़ रुपये का बजट ग्रीन क्लाइमेट फंड, संयुक्त राष्ट्र और नेपाल सरकार मिलकर जुटा रहे हैं.
कैसे खाली होगा पानी और 10 फीट वाटर लेवल घटाने की तकनीक
तकनीकी विशेषज्ञों ने इन बर्फीली झीलों के पानी को सुरक्षित तरीके से निकालने की योजना बनाई है. झीलों से पानी निकालने के लिए पक्की रेगुलेटेड नहरें और गेट्स वाला ढांचा तैयार किया जाएगा. इसके जरिए धीरे-धीरे अतिरिक्त पानी को आसपास की मुख्य नदियों में मोड़ा जाएगा. पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि झीलों का जलस्तर सिर्फ 3 मीटर यानी 10 फीट तक घटा देने से प्राकृतिक बांध टूटने का खतरा 80 फीसदी तक कम हो जाता है. साथ ही झीलों पर हाई-टेक सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) लगाए जाएंगे ताकि पल-पल की जानकारी मिलती रहे.
बिहार और यूपी में टलेगा तबाही का खतरा, भारत को पहला बड़ा फायदा
नेपाल का यह मिशन भारत के लिए भी एक सुरक्षा कवच साबित होने वाला है. नेपाल की ये चारों बर्फीली झीलें जिन नदियों के क्षेत्र में आती हैं, उनका पानी आगे चलकर भारत की कोशी और गंडक जैसी प्रमुख नदियों में आकर मिलता है. अगर 18,000 फीट की ऊंचाई पर यह प्राकृतिक बांध टूटता, तो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में भीषण तबाही मच सकती थी. झीलों का जलस्तर 10 फीट कम होने से भारत के मैदानी इलाकों पर मंडरा रहा अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का खतरा हमेशा के लिए टल जाएगा.
रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और अरबों के इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा
भारत को मिलने वाले बाकी दो फायदे बेहद अहम हैं. पहला यह कि झीलों पर लगने वाले हाई-टेक सेंसर्स का रियल-टाइम डेटा सीधे भारतीय मौसम विभाग और केंद्रीय जल आयोग के साथ शेयर किया जाएगा. इससे आपात स्थिति में भारत को निचले इलाकों को खाली कराने का पूरा समय मिल जाएगा. दूसरा फायदा यह है कि कोशी और गंडक नदियों पर बने भारत के अरबों रुपये के इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बैराज, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स, पुल और सड़कें अब पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी. इस मिशन से भारत के करोड़ों रुपये के सरकारी खजाने की बचत होगी.
नेपाल का पुराना अनुभव और त्शो रोल्पा लेक का इतिहास
इतनी ऊंचाई पर झीलों का पानी कम करना भले ही नामुमकिन सा लगे, लेकिन नेपाल यह कारनामा पहले भी सफलतापूर्वक अंजाम दे चुका है. साल 2000 में नेपाल ने मध्य हिमालय में स्थित त्शो रोल्पा झील का पानी 3 मीटर तक सफलतापूर्वक कम किया था. इसके अलावा माउंट एवरेस्ट के पास मौजूद इम्जा लेक में भी लगभग 10 साल पहले इसी तकनीक का इस्तेमाल करके जलस्तर घटाया गया था. नेपाल का यह पुराना अनुभव इस 415 करोड़ रुपये के नए मिशन को पूरा करने में बहुत मददगार साबित होगा और लाखों जिंदगियों को नया जीवनदान देगा.
यह महा-मिशन मध्य और पूर्वी नेपाल की चार बेहद दुर्गम बर्फीली झीलों पर चलाया जाएगा. इनके नाम ठुलागी, लोअर बारुण, लुमडिंग त्शो और होंगू II हैं. ये झीलें समुद्र तल से 13,280 फीट से लेकर 18,000 फीट तक की जानलेवा ऊंचाई पर स्थित हैं. इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम होता है और हर पल एवलांच का खतरा बना रहता है. वैज्ञानिकों ने इन्हें नेपाल के सिर पर मंडराता सबसे बड़ा कुदरती खतरा घोषित किया है. इस 6 साल लंबे मिशन के लिए 415 करोड़ रुपये का बजट ग्रीन क्लाइमेट फंड, संयुक्त राष्ट्र और नेपाल सरकार मिलकर जुटा रहे हैं.
कैसे खाली होगा पानी और 10 फीट वाटर लेवल घटाने की तकनीक
तकनीकी विशेषज्ञों ने इन बर्फीली झीलों के पानी को सुरक्षित तरीके से निकालने की योजना बनाई है. झीलों से पानी निकालने के लिए पक्की रेगुलेटेड नहरें और गेट्स वाला ढांचा तैयार किया जाएगा. इसके जरिए धीरे-धीरे अतिरिक्त पानी को आसपास की मुख्य नदियों में मोड़ा जाएगा. पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि झीलों का जलस्तर सिर्फ 3 मीटर यानी 10 फीट तक घटा देने से प्राकृतिक बांध टूटने का खतरा 80 फीसदी तक कम हो जाता है. साथ ही झीलों पर हाई-टेक सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) लगाए जाएंगे ताकि पल-पल की जानकारी मिलती रहे.
बिहार और यूपी में टलेगा तबाही का खतरा, भारत को पहला बड़ा फायदा
नेपाल का यह मिशन भारत के लिए भी एक सुरक्षा कवच साबित होने वाला है. नेपाल की ये चारों बर्फीली झीलें जिन नदियों के क्षेत्र में आती हैं, उनका पानी आगे चलकर भारत की कोशी और गंडक जैसी प्रमुख नदियों में आकर मिलता है. अगर 18,000 फीट की ऊंचाई पर यह प्राकृतिक बांध टूटता, तो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में भीषण तबाही मच सकती थी. झीलों का जलस्तर 10 फीट कम होने से भारत के मैदानी इलाकों पर मंडरा रहा अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का खतरा हमेशा के लिए टल जाएगा.
रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और अरबों के इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा
भारत को मिलने वाले बाकी दो फायदे बेहद अहम हैं. पहला यह कि झीलों पर लगने वाले हाई-टेक सेंसर्स का रियल-टाइम डेटा सीधे भारतीय मौसम विभाग और केंद्रीय जल आयोग के साथ शेयर किया जाएगा. इससे आपात स्थिति में भारत को निचले इलाकों को खाली कराने का पूरा समय मिल जाएगा. दूसरा फायदा यह है कि कोशी और गंडक नदियों पर बने भारत के अरबों रुपये के इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बैराज, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स, पुल और सड़कें अब पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी. इस मिशन से भारत के करोड़ों रुपये के सरकारी खजाने की बचत होगी.
नेपाल का पुराना अनुभव और त्शो रोल्पा लेक का इतिहास
इतनी ऊंचाई पर झीलों का पानी कम करना भले ही नामुमकिन सा लगे, लेकिन नेपाल यह कारनामा पहले भी सफलतापूर्वक अंजाम दे चुका है. साल 2000 में नेपाल ने मध्य हिमालय में स्थित त्शो रोल्पा झील का पानी 3 मीटर तक सफलतापूर्वक कम किया था. इसके अलावा माउंट एवरेस्ट के पास मौजूद इम्जा लेक में भी लगभग 10 साल पहले इसी तकनीक का इस्तेमाल करके जलस्तर घटाया गया था. नेपाल का यह पुराना अनुभव इस 415 करोड़ रुपये के नए मिशन को पूरा करने में बहुत मददगार साबित होगा और लाखों जिंदगियों को नया जीवनदान देगा.
