Geopolitics of Afghanistan: मॉस्को में रूस, भारत, चीन और ईरान ने तालिबान के साथ अहम बैठक की. जानिए अमेरिका के जाने के बाद अफगानिस्तान में कैसे बदला कूटनीति का पूरा खेल.

Geopolitics of Afghanistan: रूस की राजधानी मॉस्को में हाल ही में एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय बैठक हुई. इसमें रूस, चीन, भारत, ईरान, पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों के प्रतिनिधि एक साथ टेबल पर बैठे. चर्चा का केंद्र था अफगानिस्तान का भविष्य. यह वही मॉस्को शहर है जिसने कभी तालिबान पर पाबंदियां लगाई थीं. लेकिन आज स्थिति इतनी बदल चुकी है कि रूस ने तालिबान सरकार को मान्यता तक दे दी है. साल 2001 में अमेरिका ने 9/11 हमले के बाद तालिबान को सत्ता से उखाड़ फेंका था. बीस साल बाद यानी 2021 में अमेरिकी सेना वापस लौटी और तालिबान ने फिर काबुल पर कब्जा कर लिया. इस बार तालिबान बंदूक के बजाय कूटनीति के सहारे दुनिया में अपनी साख बनाने की कोशिश कर रहा है.
क्या सच में बदल चुका है तालिबान का पुराना रूप?
तालिबान के इस दूसरे कार्यकाल में शासन के दो अलग चेहरे दिख रहे हैं. एक तरफ देश के भीतर महिलाओं के अधिकारों और आजादी पर पहले जैसे ही कड़े प्रतिबंध लागू हैं. वहीं दूसरी तरफ विदेश नीति में तालिबान काफी समझदारी दिखा रहा है. उसे अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए पैसा, व्यापार और पड़ोसी देशों का साथ चाहिए. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भी मानती है कि पिछले कुछ सालों में वहां आम नागरिकों की मौतों में कमी आई है. इसके अलावा तालिबान ने ISIS-K जैसे खूंखार आतंकी गुटों पर नकेल कसी है और अफीम की खेती पर रोक लगाई है. भ्रष्टाचार रोकने और टैक्स वसूलने के मामले में भी सुधार देखा गया है.
रूस और चीन के अपने-अपने आर्थिक व सुरक्षा हित
अफगानिस्तान को लेकर रूस और चीन की रणनीति बहुत साफ है. रूस को सबसे बड़ा डर ISIS-K और दूसरे आतंकी संगठनों से है, जो उसके मध्य एशियाई पड़ोसियों के जरिए मॉस्को तक पहुंच सकते हैं. इसके अलावा रूस नहीं चाहता कि इस इलाके में दोबारा अमेरिकी सेना का प्रभाव बढ़े. वहीं चीन की नजर अफगानिस्तान के विशाल खनिज खजाने पर है. वहां तांबा, लिथियम और लोहे के बड़े भंडार मौजूद हैं. चीन ने तालिबान को अपनी महत्वाकांक्षी योजना BRI में शामिल होने का न्योता भी दिया है. चीन यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल उसके शिनजियांग प्रांत में अस्थिरता फैलाने के लिए न हो.
भारत की सुरक्षा और मध्य एशिया तक पहुंचने की मजबूरी
भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते हमेशा से बहुत गहरे रहे हैं. भारत ने काबुल में संसद भवन, सड़कें, अस्पताल और स्कूल बनाने में करीब 3 अरब डॉलर का निवेश किया है. 2021 में दूतावास बंद करने के बाद भारत ने 2022 में अपना टेक्निकल मिशन दोबारा शुरू किया. भारत की सबसे बड़ी चिंता अपनी सुरक्षा है, ताकि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवाद के लिए न हो. इसके अलावा भारत को पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भर रहे बिना मध्य एशिया के देशों तक पहुंचना है. यही वजह है कि भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रहा है और अफगानिस्तान के साथ अपने कूटनीतिक रिश्तों को दूतावास स्तर पर अपग्रेड कर रहा है.
ईरान की रणनीति और चाबहार बंदरगाह का गणित
इरान के लिए अफगानिस्तान एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है. ईरान की प्राथमिकता अपनी सीमाओं की सुरक्षा करना और शरणार्थियों की आमद को रोकना है. इसके साथ ही व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिहाज से भी दोनों देश एक-दूसरे से जुड़े हैं. ईरान का चाबहार बंदरगाह इस पूरे समीकरण की सबसे मजबूत कड़ी है. भारत इस बंदरगाह को विकसित कर रहा है ताकि बिना पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किए सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक माल पहुंचाया जा सके. इस एक मुद्दे पर भारत, ईरान और अफगानिस्तान तीनों के रणनीतिक हित आपस में पूरी तरह मिल जाते हैं.
पुराने दोस्त पाकिस्तान के साथ तालिबान की तीखी तल्खी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला बदलाव पाकिस्तान और तालिबान के रिश्तों में आया है. 1996 के दौर में पाकिस्तान तालिबान का सबसे बड़ा मददगार हुआ करता था. लेकिन आज दोनों देशों के बीच सीमा पर भारी तनाव बना हुआ है. पाकिस्तान का आरोप है कि TTP यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के आतंकी अफगानिस्तान की सरजमीं से उस पर हमले करते हैं. हालांकि तालिबान इन दावों को खारिज करता आया है. दोनों तरफ से लगातार हो रही गोलीबारी ने रिश्तों को बेहद खराब मोड़ पर पहुंचा दिया है. इस तरह अफगानिस्तान के नए घटनाक्रम ने पूरे दक्षिण एशिया का कूटनीतिक गणित बदल दिया है.
