supreme court marital rape hearing: इस खबर में जानिए मैरिटल रेप पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही बड़ी सुनवाई के बारे में। समझिए कि क्या पत्नी के साथ क्रूरता करने वाले पति पर दुष्कर्म का केस दर्ज होगा और शादी के बाद महिला के अधिकारों पर कोर्ट ने क्या कहा.

supreme court marital rape hearing: सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप यानी वैवाहिक बलात्कार से जुड़े बेहद गंभीर कानूनी मुद्दे पर अहम सुनवाई शुरू हुई है. अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या कानून में मिले वैवाहिक अपवाद के बावजूद पत्नी के साथ क्रूरता करने वाले पति पर दुष्कर्म का मुकदमा चलाया जा सकता है? चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस मामले की विस्तृत पड़ताल कर रही है. सुप्रीम कोर्ट सबसे पहले कर्नाटक हाई कोर्ट के एक फैसले से जुड़े मामले को सुनेगा. इसके बाद मैरिटल रेप अपवाद की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार किया जाएगा.
कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले से उभरा बड़ा कानूनी सवाल
सुप्रीम कोर्ट सबसे पहले कर्नाटक के उस चर्चित मामले पर विचार कर रहा है, जहाँ एक पति पर अपनी पत्नी के साथ भीषण यौन हिंसा का आरोप लगा है. पत्नी की तरफ से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि पीड़िता के साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया गया. कर्नाटक हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पति पर दुष्कर्म की धारा के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट इस बात की गहराई से जांच कर रहा है कि क्या कानून के मौजूदा दायरे में रहकर भी ऐसे मामलों में पति के खिलाफ दुष्कर्म का केस दर्ज हो सकता है या नहीं.
सुप्रीम कोर्ट के सामने खड़े हैं दो बड़े सवाल
इस पूरी सुनवाई के दौरान देश की सर्वोच्च अदालत के सामने दो सबसे मुख्य कानूनी सवाल मौजूद हैं. पहला सवाल यह है कि क्या कानून में दिए गए मैरिटल रेप के अपवाद की सीमित व्याख्या करके पति को दोषी ठहराया जा सकता है? दूसरा और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वैवाहिक अपवाद भारतीय संविधान का उल्लंघन करता है और इसे पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए? वरिष्ठ वकील करुणा नंदी ने कोर्ट में दलील दी कि कानून की व्याख्या और उसकी संवैधानिक वैधता के दोनों सवालों को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
शादी से नहीं खत्म होती महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने शादी के बाद महिलाओं के अधिकारों को लेकर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विवाह हो जाने से किसी भी व्यक्ति की अपनी व्यक्तिगत आजादी और स्वायत्तता खत्म नहीं हो जाती. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत एक आपराधिक कानून की समीक्षा कर रही है. इसलिए दुष्कर्म की धारा लागू करने से पहले यह तय करना होगा कि कानून में दिया गया अपवाद असंवैधानिक या मनमाना है या नहीं. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि यौन हिंसा में गंभीर चोट या मौत होने पर अन्य आपराधिक धाराएं पहले से लागू होती हैं.
निर्भया केस के बाद कानूनों में आए बदलावों पर चर्चा
अदालत में सुनवाई के दौरान साल 2012 के ऐतिहासिक निर्भया कांड के बाद यौन अपराधों के कानूनों में किए गए सुधारों पर भी बात हुई. उस समय दुष्कर्म की कानूनी परिभाषा का विस्तार किया गया था. इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता (BNS) में भारतीय दंड संहिता की पुरानी धारा 377 को हटाए जाने के असर पर भी बहस हुई. वकीलों का कहना है कि धारा 377 हटने से विवाह के भीतर होने वाली अन्य अप्राकृतिक यौन हिंसा के खिलाफ कानूनी विकल्पों को लेकर भ्रम पैदा हो गया है.
केंद्र सरकार रखेगी अपना रुख, तीन हफ्ते बाद होगी अंतिम सुनवाई
मामले में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिया है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट को पूरी सहायता प्रदान करेगी. केंद्र सरकार पहले से दाखिल किए गए अपने जवाबों की प्रतियां सभी पक्षों को उपलब्ध कराएगी. जस्टिस बागची ने कहा कि आपराधिक कानूनों की समीक्षा करते समय अदालत को काफी सावधानी बरतनी होती है ताकि फैसले का असर पूरे समाज पर संतुलित रहे. सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक मामले को तीन सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है.
