भारतीय जनता पार्टी का एक बड़ा कार्यक्रम चल रहा था, मंच पर नेता मौजूद थे, कार्यकर्ता मौजूद थे, नारे लग रहे थे, लेकिन उस दिन सबसे ज्यादा चर्चा किसी चुनावी रणनीति की नहीं हुई, चर्चा हुई एक बयान की। यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने मंच से कहा, ब्राह्मण समाज बीजेपी के साथ है, योगी आदित्यनाथ के साथ है और आगे भी रहेगा, बयान खत्म हुआ, तालियां बजीं, कार्यक्रम आगे बढ़ गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक सवाल गूंजने लगा, आखिर ब्रजेश पाठक को यह बात कहने की जरूरत क्यों पड़ी? किसने कहा कि ब्राह्मण बीजेपी के साथ नहीं हैं? क्यों बार-बार यह संदेश देना पड़ रहा है कि ब्राह्मण नाराज़ नहीं हैं? और क्या 2027 के चुनाव से पहले बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपना सामाजिक संतुलन बनाए रखना है? एक ऐसी कहानी जो सत्ता के गलियारों से निकलकर सीधे 2027 की लड़ाई तक पहुंचती है।

आखिर शुरू कहां से हुई ठाकुर बनाम ब्राह्मण की चर्चा?
साल 2017 में जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने, तब बीजेपी के भीतर और बाहर दोनों जगह एक चर्चा शुरू हुई, चर्चा यह कि योगी खुद ठाकुर समुदाय से आते हैं, इसके बाद जैसे-जैसे सरकार आगे बढ़ी, विपक्ष ने एक नैरेटिव गढ़ना शुरू किया, समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाए, बसपा ने सवाल उठाए, कहा जाने लगा कि, सरकार में ठाकुर अधिकारियों का प्रभाव बढ़ रहा है, बड़े पदों पर ठाकुर चेहरे ज्यादा दिखाई दे रहे हैं, निर्णय लेने वाली जगहों पर भी ठाकुरों की मौजूदगी बढ़ी है, इन दावों में कितनी सच्चाई थी और कितनी राजनीति…यह बहस अलग हो सकती है, लेकिन राजनीति में कई बार तथ्य से ज्यादा धारणा असर डालती है और यही धारणा धीरे-धीरे फैलने लगी।
विकास दुबे के एनकाउंटर से बहस हुई तेज
फिर आया कानपुर का बिकरू कांड, विकास दुबे का नाम पूरे देश में चर्चा में आया, लेकिन इस घटना के बाद सिर्फ अपराध और कानून व्यवस्था पर बहस नहीं हुई, राजनीति भी शुरू हो गई, कुछ ब्राह्मण संगठनों ने सवाल उठाए, विपक्ष ने इसे जातीय चश्मे से देखने की कोशिश की और यहीं से ब्राह्मण नाराज़गी की चर्चा पहले से ज्यादा तेज होने लगी, भले ही बीजेपी लगातार इन आरोपों को खारिज करती रही, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह सवाल आज भी बना हुआ है।
बीजेपी की ताकत सिर्फ हिंदुत्व नहीं, एक सामाजिक गठबंधन भी है
जब बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपना विस्तार शुरू किया, तो उसने सिर्फ एक वोट बैंक पर भरोसा नहीं किया, उसने एक बड़ा सामाजिक गठबंधन खड़ा किया।
ब्राह्मण जुड़े, ठाकुर जुड़े, वैश्य जुड़े, गैर-यादव ओबीसी जुड़े, दलितों का एक हिस्सा जुड़ा, यानी बीजेपी की ताकत किसी एक जाति की नहीं थी, बल्कि कई जातियों के एक साथ आने की कहानी थी, यही गठबंधन बीजेपी को सत्ता तक लेकर आया, यही गठबंधन उसे लगातार चुनाव जिताता रहा, लेकिन राजनीति का एक नियम है, सत्ता में जितना ज्यादा समय बीतता है, प्रतिनिधित्व का सवाल उतना ही बड़ा होता जाता है और यहीं से शुरू होती है इस कहानी की असली पटकथा।
बीजेपी ने खतरे को जल्दी समझ लिया
बीजेपी जानती थी कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोट बैंक की अहमियत क्या है, ब्राह्मण लंबे समय से बीजेपी के कोर वोटर माने जाते रहे हैं, अगर उनके बीच यह धारणा बनती कि सत्ता में उनकी हिस्सेदारी कम हो रही है, तो विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना सकता था, यहीं से बीजेपी ने अपने ब्राह्मण चेहरों को ज्यादा सक्रिय करना शुरू किया और इस रणनीति का सबसे बड़ा चेहरा बने ब्रजेश पाठक।
ब्रजेश पाठक ने दिया राजनीतिक संदेश
साल 2022 में जब बीजेपी दोबारा सत्ता में आई, तो पार्टी ने ब्रजेश पाठक को डिप्टी सीएम बनाया, राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे सिर्फ एक नियुक्ति नहीं माना।
इसे एक संदेश के तौर पर देखा गया, संदेश यह कि बीजेपी में ब्राह्मण नेतृत्व की भूमिका खत्म नहीं हुई है, यही कारण है कि जब भी ब्राह्मण नाराज़गी की चर्चा होती है, सबसे पहले ब्रजेश पाठक सामने दिखाई देते हैं,वो जहा भी जा रहे हैं इस बात को करना नहीं भुल रहे हैं कि, ब्राह्मण बीजेपी के साथ हैं, ब्राह्मण योगी के साथ हैं और शायद यह सिर्फ बयान नहीं… बल्कि 2027 यूपी विधानसभा चुनाव के पहले की एक राजनीतिक रणनीति भी है।
क्या सच में लड़ाई सिर्फ ब्राह्मण और ठाकुर की है?
असल में बीजेपी की चुनौती सिर्फ ब्राह्मण और ठाकुर तक सीमित नहीं है, उसे कुर्मी भी चाहिए, उसे मौर्य भी चाहिए, उसे निषाद भी चाहिए, उसे दलित भी चाहिए, उसे व्यापारी वर्ग भी चाहिए, उसे महिला वोट भी चाहिए, उसे युवा वोट भी चाहिए, यानी बीजेपी का पूरा चुनावी मॉडल सामाजिक संतुलन पर टिका हुआ है, अगर किसी एक वर्ग को यह महसूस होने लगे कि उसकी हिस्सेदारी कम हो रही है, तो विपक्ष राजनीतिक लाभ लेने के लिए, उसे राजनीतिक मुद्दा बना देता है।
योगी फैक्टर कितना बड़ा है?
योगी आदित्यनाथ, आज बीजेपी में योगी सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं हैं, वे पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं, उनकी लोकप्रियता सिर्फ ठाकुर समाज तक सीमित नहीं है, कानून व्यवस्था, बुलडोजर राजनीति, हिंदुत्व और मजबूत नेतृत्व की छवि ने उन्हें एक बड़े नेता के रूप में स्थापित किया है, यही वजह है कि बीजेपी का एक वर्ग मानता है कि योगी फैक्टर जातीय असंतोष की चर्चा पर भारी पड़ सकता है, लेकिन उत्तर प्रदेश का चुनाव सिर्फ चेहरे से नहीं जीता जाता।
यहां चुनाव बूथ भी जीतता है, बिरादरी भी जीतती है और सामाजिक संतुलन भी जीतता है।
2027 की लड़ाई आखिर होगी किस बात की?
समाजवादी पार्टी PDA की बात करेगी, विपक्ष प्रतिनिधित्व का सवाल उठाएगा, टिकटों पर बहस होगी, संगठन में हिस्सेदारी पर बहस होगी और तब बीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा, क्या वह अपने विशाल सामाजिक गठबंधन को पहले की तरह एकजुट रख पाएगी? क्या ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, दलित और गैर-यादव ओबीसी एक ही छतरी के नीचे बने रहेंगे? या फिर विपक्ष सामाजिक असंतुलन की चर्चा को राजनीतिक मुद्दा बनाने में सफल होगा?
सामाजिक संतुलन से जीते जाते हैं यूपी में चुनाव
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सरकारें सिर्फ विकास से नहीं बनतीं, सिर्फ नारों से नहीं बनतीं, सिर्फ चेहरों से नहीं बनतीं, वे सामाजिक गठबंधनों से बनती हैं।
और जब कोई पार्टी लंबे समय तक सत्ता में रहती है, तो उसकी सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं होता, उसकी सबसे बड़ी चुनौती होती है, अपने ही गठबंधन को साथ बनाए रखना, यही वजह है कि 2027 की लड़ाई सिर्फ योगी बनाम अखिलेश नहीं होगी, यह लड़ाई सामाजिक संतुलन की भी होगी और शायद इसी सवाल का जवाब तय करेगा कि उत्तर प्रदेश की अगली सत्ता किसके हाथ में होगी।
यह भी पढ़ें- कंगना रनौत और PM मोदी पर आपत्तिजनक पोस्ट! सपा विधायक के खिलाफ मुकदमा दर्ज; शुरू हुई जांच
