Allahabad High Court Big Verdict: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि गरीबी और लाचारी को जमानत के बाद जेल में रहने की वजह नहीं बनाया जा सकता. कानून का मकसद आरोपी के लिए मुश्किलें खड़ी करना नहीं, बल्कि इंसाफ को व्यावहारिक और सुलभ बनाना है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश की कानूनी व्यवस्था और कैदियों के मानवाधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि न्याय की अवधारणा केवल कागजों या बड़ी-बड़ी बहसों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि समाज के सबसे गरीब और लाचार व्यक्ति के लिए उसका व्यावहारिक रूप से सुलभ होना भी उतना ही जरूरी है. हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति बेहद गरीब है और कई मुकदमों में अलग-अलग जमानतदार लाने में असमर्थ है, तो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बंधक नहीं बनाया जा सकता.
जमानतदार नहीं मिलने से अटका था मामला
यह ऐतिहासिक आदेश न्यायमूर्ति की एकलपीठ ने कानपुर नगर के निवासी कमलेश कुमार उर्फ कमलेश फाइटर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया. याची कमलेश के खिलाफ अलग-अलग थानों में कुल 10 आपराधिक मामले दर्ज हैं. हालांकि कोर्ट से उसे सभी मामलों में जमानत मिल चुकी थी, लेकिन नियम के मुताबिक हर मुकदमे के लिए अलग-अलग स्थानीय जमानतदार (Surety) पेश करने की विवशता थी. आर्थिक रूप से बेहद कमजोर होने के कारण वह इतने जमानतदारों का इंतजाम नहीं कर पा रहा था, जिसके चलते जमानत मिलने के बावजूद वह महीनों से जेल में सड़ने को मजबूर था.
सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला
याची के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष पुरजोर दलील पेश की कि आरोपी अत्यंत निर्धन पृष्ठभूमि से आता है. उसके लिए 10 अलग-अलग मुकदमों में अलग-अलग लोगों को जमानतदार के रूप में अदालत के सामने खड़ा करना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है. हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के प्रसिद्ध ‘सनी निषाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले की नजीर का हवाला दिया. कोर्ट ने कहा कि कानून का मुख्य मकसद न्याय की राह को सुगम बनाना है, न कि किसी आरोपी के सामने ऐसी कठिन परिस्थितियां खड़ी करना जो उसकी रिहाई के रास्ते को ही हमेशा के लिए बंद कर दें.
सिर्फ दो जमानतदारों के आधार पर रिहाई
हाईकोर्ट ने मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए कमलेश फाइटर को बहुत बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने आदेश दिया कि याची को सभी 10 मामलों में अलग-अलग जमानतदार लाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा. वह केवल दो जमानतदार पेश करेगा—जिसमें से एक जमानतदार उसके अपने परिवार का सदस्य होना चाहिए और दूसरा व्यक्ति उसका स्थानीय होना चाहिए. इन दो जमानतदारों के व्यक्तिगत बांड के आधार पर ही उसे सभी 10 मुकदमों में तुरंत जेल से रिहा कर दिया जाए.
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