उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं मायावती। साल 2011, नोएडा में एक बड़ा कार्यक्रम रखा जाता है, फॉर्मूला वन रेस ट्रैक यानी बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का उद्घाटन होना था, पूरे दुनिया की नजर नोएडा पर थी, अधिकारी तैयारी में जुटे थे, सुरक्षा के इंतजाम हो चुके थे, लेकिन कार्यक्रम से पहले एक बार फिर वही पुरानी चर्चा शुरू हो गई, मुख्यमंत्री नोएडा जाएंगी? राजनीतिक गलियारों में यह सवाल इसलिए पूछा जा रहा था क्योंकि, उस समय तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अजीब मान्यता जन्म ले चुकी थी। कहा जाता था कि, जो मुख्यमंत्री नोएडा जाता है, उसकी कुर्सी चली जाती है, उसके बाद भी मायावती ने नोएडा के कार्यक्रम में आई, कार्यक्रम हुआ, तस्वीरें अखबारों में छपीं और कुछ महीने बाद चुनाव हुए, मायावती सत्ता से बाहर हो गईं। बस फिर क्या था… नोएडा के श्राप की कहानी में एक और अध्याय जुड़ गया। लेकिन सवाल है…
कहते हैं हर अंधविश्वास की शुरुआत किसी संयोग से होती है, नोएडा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, साल 1976 में नोएडा की स्थापना हुई, दिल्ली से सटा यह शहर तेजी से विकसित हो रहा था, नोएडा में इंड्रस्टी लग रही थी, नई कॉलोनियां बस रही थीं, इन्वेस्टमेंट बढ़ रहा था, लेकिन 1980 के दशक के आखिर में कुछ ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम हुए जिन्होंने एक अजीब कहानी को जन्म दे दिया…
वीर बहादुर सिंह और पहली चर्चा
साल 1988, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे वीर बहादुर सिंह, वे नोएडा दौरे पर आए, विकास परियोजनाओं की समीक्षा की, सरकारी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा, यह पूरी तरह राजनीतिक घटना थी, लेकिन राजनीति में कहानियां तथ्यों से ज्यादा तेजी से फैलती हैं। इसके बाद कुछ लोगों ने कहना शुरू किया, नोएडा गए थे ना… तब किसी ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, फिर आया दूसरा संयोग, वीर बहादुर सिंह के बाद मुख्यमंत्री बने नारायण दत्त तिवारी, एन.डी. तिवारी भी नोएडा गए, विकास परियोजनाओं का निरीक्षण करने, लेकिन कुछ समय बाद उनकी सरकार भी चली गई, अब राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी शुरू हो चुकी थी। लोग कहने लगे, लगता है नोएडा और मुख्यमंत्री की कुर्सी का कोई कनेक्शन है। अब तक यह सिर्फ मजाक था, लेकिन आगे चलकर यही मजाक एक राजनीतिक मिथक बनने वाला था।
1990 का दशक और अंधविश्वास की मजबूत नींव
1990 का दशक उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे उथल-पुथल वाला दौर था, उस समय… मंडल था, कमंडल था, गठबंधन थे, नई पार्टियां उभर रही थीं।
पुराने समीकरण टूट रहे थे, इस दौरान मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने, फिर सत्ता बदली, कल्याण सिंह आए, फिर राजनीतिक समीकरण बदले, फिर मायावती आईं, फिर सरकार बदली। लगातार बदलती सरकारों और नोएडा दौरों को जोड़कर लोगों ने अपनी-अपनी कहानियां बनानी शुरू कर दीं, हालांकि सरकारें चुनाव, गठबंधन और राजनीतिक कारणों से बदली थीं, लेकिन चर्चा किसी और चीज की हो रही थी, चर्चा हो रही थी नोएडा की।
जब मुख्यमंत्री नोएडा जाने से बचने लगे
धीरे-धीरे स्थिति ऐसी हो गई कि मुख्यमंत्री के नोएडा जाने की खबर खुद एक राजनीतिक खबर बन जाती थी, कार्यक्रम बनते, अधिकारी तैयारी करते, स्थानीय नेता उत्साहित होते, लेकिन कई बार आखिरी समय में कार्यक्रम टल जाता, पत्रकारों के बीच एक मजाक मशहूर हो गया था, मुख्यमंत्री अमेरिका चले जाएंगे, लंदन चले जाएंगे, लेकिन नोएडा नहीं जाएंगे और मजेदार बात यह थी कि, इस मजाक में लोगों को सच्चाई भी नजर आने लगी।
मायावती ने मिथक को चुनौती दी
मायावती उन नेताओं में नहीं थीं जो राजनीतिक अंधविश्वासों को ज्यादा महत्व दें, उन्होंने नोएडा का दौरा किया, लेकिन 2012 के चुनाव में उनकी सरकार चली गई, बस फिर क्या था… मिथक में विश्वास करने वालों को एक और उदाहरण मिल गया।
अखिलेश यादव और नोएडा का डर
2012 में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, युवा चेहरा, नई सोच, नई राजनीति। लोगों को लगा कि अब यह मिथक खत्म हो जाएगा, लेकिन शुरुआती दौर में अखिलेश भी नोएडा जाने को लेकर बेहद सावधान नजर आए, उनको कुर्सी जाने का इतना डर था कि, 2013 और 2016 में नोएडा की कई विकास प्रोजेक्ट जैसे यमुना एक्सप्रेसवे और नैसकॉम प्रोजेक्ट का उद्घाटन, अखिलेश ने लखनऊ और दिल्ली से ही वर्चुअली किया, लेकिन तब तक नोएडा का श्राप राजनीति का स्थायी हिस्सा बन चुका था। और 2017 में उनकी सरकार चली गई।
फिर आए योगी और कहानी पलट गई
2017 में उत्तर प्रदेश में नई सरकार बनी, मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ, योगी का अंदाज अलग था, उन्होंने शुरुआत से ही साफ कर दिया कि वे इस तरह के राजनीतिक अंधविश्वासों में विश्वास नहीं करते, कुछ ही समय बाद वे नोएडा पहुंचे, फिर दोबारा गए, फिर कई बार गए, जेवर एयरपोर्ट की समीक्षा हो या डेटा सेंटर परियोजनाएं हों या निवेशकों की बैठक, नोएडा उनकी सरकार की हमेशा प्राइरोटीस में शामिल रहा, लेकिन असली झटका उस मिथक को तब लगा… जब 2022 में योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बन गए।
45 साल बाद टूटा सबसे बड़ा राजनीतिक अंधविश्वास?
दशकों तक कहा जाता रहा कि नोएडा जाना सत्ता के लिए अशुभ है, लेकिन योगी की वापसी के बाद पहली बार लोगों ने कहना शुरू किया, शायद यह सब सिर्फ संयोग था, शायद कुर्सी नोएडा नहीं छीनता, कुर्सी जनता देती है और जनता ही लेती है, राजनीति सिर्फ आंकड़ों से नहीं चलती, राजनीति कहानियों से भी चलती है, कभी कोई नारा इतिहास बन जाता है, कभी कोई अफवाह मिथक बन जाती है और कभी एक शहर… पूरे राज्य की राजनीति में रहस्य बन जाता है, नोएडा का श्राप भी ऐसी ही कहानी है, एक ऐसी कहानी जिसमें तथ्य कम थे… संयोग ज्यादा थे, लेकिन चर्चा इतनी हुई कि कई मुख्यमंत्री उस शहर का नाम सुनकर भी सोचने लगते थे, आज नोएडा यूपी की आर्थिक ताकत का प्रतीक है, लेकिन इसकी पहचान का एक हिस्सा हमेशा उस राजनीतिक मिथक से भी जुड़ा रहेगा… जिसे लोग आज भी मुस्कुराते हुए याद करते हैं, नोएडा का श्राप!
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