Champat rai clean chit: राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को चंदा विवाद की एसटीएफ (STF) जांच में क्लीन चिट मिल गई है, लेकिन ट्रस्ट में पारदर्शिता लाने के लिए अब वित्तीय शक्तियों को बांटने और ऑडिट सिस्टम को मजबूत करने की बड़ी तैयारी है.

Champat rai clean chit: सबको पहले से ही पता था कि, चंपत राय को कुछ होने वाला नहीं है। चंपत राय कोई हल्के आदमी नहीं हैं। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। RSS प्रमुख मोहन भागवत के भी बेहद करीबी माने जाते हैं, यही कारण है कि उनकी प्रोफाइल इतनी मजबूत है। कोई ऐरा गैरा आदमी राम मंदिर जैसे हाई प्रोफाइल मंदिर की पूरी जिम्मेदारी नहीं संभाल सकता। जहां हर साल अरबों का चढ़ावा चढ़ता है। निर्माण से लेकर कलेक्शन तक की जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी, इसीलिए दावा किया जा रहा था कि इनको क्लीन चिट मिलना तय था। सूत्रों के अनुसार राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को STF जांच में क्लीन चिट दे दी गई है। लेकिन इस क्लीन चिट के साथ ही राम मंदिर की पूरी व्यवस्था बदलने की तैयारी शुरू हो गई है। चर्चा तेज है कि चंपत राय के हाथ में जो अनलिमिटेड पावर थी, उसको अब लिमिटेड कर दिया जाएगा, सवाल ये है कि बिना FIR के क्लीन चिट कैसे मिल गई? और अगर गड़बड़ी हुई भी है तो सिर्फ निचले स्तर के लोग ही जिम्मेदार क्यों?
STF की जांच में दावा किया जा रहा है कि, गड़बड़ी निचले स्तर पर हुई। यानी सह सचिव से लेकर व्यवस्थापक, सेवादार तक पर कार्रवाई हो सकती है। उन पर केस दर्ज हो सकते हैं। कुछ लोगों को जेल भी जाना पड़ सकता है, लेकिन चंपत राय को कुछ भी नहीं होगा। ये चर्चा अब ट्रस्ट के अंदर भी है। ट्रस्ट के कुछ सदस्यों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ‘ऊपर के लोग बच गए, नीचे वाले फंसेंगे’। चंपत राय बच गए, लेकिन अब इसके बाद राम मंदिर की पूरी व्यवस्था बदल जाएगी। क्योंकि इस पूरे विवाद के बाद ट्रस्ट पर पारदर्शिता का दबाव बहुत बढ़ गया है।
अब पावर लिमिटेड क्यों होगी?
सूत्रों के अनुसार पिछले हफ्ते ट्रस्ट की एक अहम बैठक हुई। इसमें फैसला लिया गया है कि अब एक व्यक्ति के पास सारी शक्तियां नहीं रहेंगी। निर्माण कार्य, चंदा कलेक्शन, मंदिर प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था… हर काम के लिए अलग अलग कमेटी बनेगी। हर कमेटी का एक अध्यक्ष होगा और फैसले बहुमत से लिए जाएंगे। यानी जो पावर अब तक चंपत राय के पास केंद्रित थी, उसे बांट दिया जाएगा। वित्तीय फैसले लेने के लिए भी अब सामूहिक सहमति जरूरी होगी। 10 लाख से ऊपर के किसी भी खर्च के लिए पूरी ट्रस्ट की मंजूरी लेनी होगी। ट्रस्ट में पारदर्शिता लाने के लिए ऑडिट सिस्टम को और मजबूत किया जाएगा। हर तीन महीने में CAG की तर्ज पर ऑडिट कराया जाएगा और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी।
STF जांच में क्या निकला?
SIT जांच में नई नई बातें सामने आ रही हैं। सूत्रों का दावा है कि चंदे के रखरखाव में कुछ खामियां मिलीं। दान की रसीद देने में लापरवाही, कैश हैंडलिंग में गड़बड़ी और खर्च के रिकॉर्ड में पारदर्शिता की कमी पाई गई। जांच में ये भी सामने आया कि कई बार बड़े दानदाताओं को रसीद नहीं दी गई। कुछ निर्माण सामग्री की खरीद में बाजार भाव से ज्यादा भुगतान के आरोप भी लगे। हालांकि STF ने साफ किया कि ये प्रशासनिक चूक है, आपराधिक साजिश के सबूत नहीं मिले। इसी आधार पर अब चंदे की देखरेख का पूरा तरीका बदला जाएगा। डिजिटल पेमेंट को 100% बढ़ावा दिया जाएगा। हर दान की रियल टाइम एंट्री होगी। ट्रस्ट की वेबसाइट पर हर महीने का हिसाब किताब, आय व्यय का पूरा ब्यौरा डाला जाएगा।
सबसे बड़े 3 सवाल
बिना FIR के क्लीन चिट कैसे?
कानून के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि जब मामला करोड़ों के चंदे का है तो बिना FIR के जांच कैसे पूरी हो गई? STF ने किस आधार पर क्लीन चिट दी?
निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी?
अगर निचले स्तर के लोग दोषी हैं तो उनकी निगरानी की जिम्मेदारी महासचिव के तौर पर चंपत राय की ही थी। तो फिर उन पर कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या ये सिर्फ दिखावा है?
ट्रस्ट के कुछ सदस्य ही कह रहे हैं कि पावर बांटने का फैसला सिर्फ जनता का भरोसा जीतने के लिए है। असल में फैसले अब भी एक ही जगह से होंगे।
फिलहाल चंपत राय को क्लीन चिट मिल गई है। लेकिन राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यशैली पर उठे सवालों के बाद व्यवस्था में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। अयोध्या के संत समाज ने भी कहा है कि मंदिर ट्रस्ट में पारदर्शिता जरूरी है। क्योंकि राम मंदिर सिर्फ ईंट पत्थर का ढांचा नहीं… करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। लोग अपनी कमाई का हिस्सा दान करते हैं। अब देखना होगा कि अनलिमिटेड पावर को लिमिटेड करने का ये फैसला ट्रस्ट में वाकई पारदर्शिता लाता है या नहीं। क्या हर दान का हिसाब जनता के सामने आएगा? क्या अब फैसले कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहेंगे? क्योंकि आस्था के साथ पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। और अगर पारदर्शिता नहीं होगी तो आस्था भी सवालों के घेरे में आ जाएगी।
