prisoners remission court: सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि लंबे समय से जेल में बंद कैदियों की समय से पहले रिहाई या सजा में रिमिशन की याचिकाओं पर संबंधित अधिकारियों को बिना किसी अनावश्यक देरी के 3 महीने के भीतर फैसला करना होगा.

prisoners remission court: सुप्रीम कोर्ट ने देश की जेलों में बंद कैदियों को लेकर एक बहुत ही मानवीय और बड़ा फैसला सुनाया है भाई. अदालत ने साफ-साफ कहा है कि जो कैदी बहुत लंबे समय से जेल की सलाखों के पीछे हैं, उनकी समय से पहले रिहाई या सजा कम करने की अर्जियों पर ढिलाई नहीं चलेगी. देश की सबसे बड़ी अदालत ने साफ कर दिया है कि सक्षम सरकारी अधिकारियों को बिना किसी फालतू देरी के ऐसी फाइलों पर तुरंत फैसला लेना होगा. अदालत का मानना है कि लंबे समय की कैद को यूं ही नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. आइए समझते हैं कि कोर्ट ने इस पूरे मामले पर क्या निर्देश दिए हैं और यह पूरा मामला आखिर है क्या.
सालों से लटकी फाइलों पर तीन महीने के भीतर फैसला लेने का सख्त आदेश
जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने शुक्रवार को इस मामले पर सुनवाई की. कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि जो लोग अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जेल में काट चुके हैं, उनकी सजा कम करने (रिमिशन) वाली याचिकाओं पर अधिकारियों को तेजी से काम करना चाहिए. पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ही एक पुराने आदेश का हवाला देते हुए सरकारी अफसरों की जिम्मेदारी तय कर दी है. कोर्ट ने साफ निर्देश दिया है कि अगर कैदी रिमिशन के लिए नया आवेदन करते हैं, या उनकी अर्जी पहले से पेंडिंग है, तो अधिकारियों को मौजूदा नीति और कानून के हिसाब से तीन महीने के अंदर-अंदर अपना आखिरी फैसला सुनाना होगा.
डकैती के पुराने मामले में उम्रकैद काट रहे दो कैदियों से जुड़ा है यह पूरा मामला
यह पूरा मामला साल 2006 का है, जब तमिलनाडु के तिंडिवनम की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने डकैती के केस में मोहन बाबू और पलानी नाम के दो आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इसके बाद दोनों ने इस फैसले के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 2 जुलाई 2008 को हाईकोर्ट ने भी उनकी अपील खारिज कर दी. आखिर में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने भी बीती 10 जुलाई 2026 को निचली अदालतों के फैसले को सही माना और उनकी सजा में कोई दखल नहीं दिया. लेकिन कोर्ट ने देखा कि ये दोनों कैदी बहुत लंबे समय से जेल के अंदर बंद हैं, इसलिए उन्हें सजा में छूट के लिए आवेदन करने का एक मौका जरूर मिलना चाहिए.
कोर्ट ने माना कि 14 और 20 साल की कैद छोटा समय नहीं होती
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान यह बात खुलकर मानी कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को पलटने का कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि अपराध गंभीर था. लेकिन अदालत ने मानवीय पहलू को ऊपर रखते हुए दोनों दोषियों की जेल की अवधि पर ध्यान दिया. रिकॉर्ड के मुताबिक, मोहन बाबू जेल में 14 साल से ज्यादा का वक्त काट चुके हैं, वहीं पलानी को जेल के अंदर 20 साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है. इसी लंबी अवधि को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अधिकारी उनकी रिहाई या सजा कम करने की अर्जी पर विचार करें, तो इस बात को बिल्कुल दिमाग से निकाल दें कि उनकी मुख्य अपील सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो चुकी है.
जब तक रिहाई की अर्जी पर फैसला न हो, तब तक कैदी रहेंगे अंतरिम जमानत पर बाहेर
कैदियों को राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनके जेल से बाहर रहने का रास्ता भी साफ कर दिया है. अदालत ने आदेश दिया है कि मोहन बाबू को पहले जो अंतरिम जमानत मिली हुई थी, वह तब तक जारी रहेगी जब तक कि उनकी रिमिशन (सजा कम करने वाली) अर्जी पर सरकार कोई अंतिम फैसला नहीं ले लेती. ठीक इसी तरह दूसरे कैदी पलानी को लेकर भी कोर्ट ने कहा है कि अगर वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें भी निचली अदालत की शर्तों के हिसाब से अंतरिम जमानत दे दी जाए. उनकी यह जमानत भी तब तक लागू रहेगी जब तक कि उनकी रिहाई की फाइल पर पूरी तरह से फैसला नहीं आ जाता.
