Russia oil sanctions: अमेरिकी सांसदों और ट्रंप प्रशासन के बीच रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले नए बिल पर सहमति बन गई है, जिससे भारत के लिए सस्ते रूसी तेल के आयात को लेकर बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक चुनौती पैदा हो सकती है.

Russia oil sanctions: दुनिया के तेल बाजार और कूटनीति से जुड़ी एक बहुत बड़ी खबर आ रही है भाई. अमेरिकी सांसदों (सीनेटरों) और व्हाइट हाउस के बीच एक बेहद कड़ा कानून बनाने को लेकर सहमति बन गई है. इस नए कानून का सीधा मकसद उन देशों को सबक सिखाना है, जो यूक्रेन युद्ध के बावजूद रूस से धड़ल्ले से कच्चा तेल और गैस खरीद रहे हैं. इस पूरे घटनाक्रम का हमारे देश भारत पर बहुत बड़ा और सीधा असर पड़ने वाला है. अमेरिका के चार बड़े सीनेटरों ने साफ कर दिया है कि वे ट्रंप प्रशासन के साथ मिलकर इस अपडेटेड पाबंदी बिल को जल्द से जल्द पास कराने वाले हैं. आइए समझते हैं कि अमेरिका का यह नया गेम प्लान क्या है और इससे भारत की मुश्किलें कैसे बढ़ सकती हैं.
पुतिन की युद्ध मशीन को रोकने के लिए अमेरिका ने कसा शिकंजा
शुक्रवार को अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल, लिंडसे ग्राहम, जीन शाहीन और रोजर विकर ने एक साझा बयान जारी किया. उन्होंने गर्व से एलान किया कि वे रूस पर अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाने वाले कानून को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. सीनेटरों का कहना है कि रूस लगातार यूक्रेन के आम नागरिकों पर हमले तेज कर रहा है. ऐसे में यह बेहद जरूरी हो गया है कि जो देश रूसी तेल और प्राकृतिक गैस खरीदकर व्लादिमीर पुतिन की युद्ध मशीन को पैसा दे रहे हैं, उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़े. अमेरिकी सरकार का मानना है कि रूस की कमाई का सबसे बड़ा जरिया उसका तेल है और अगर इसी को ब्लॉक कर दिया जाए, तो वह घुटनों पर आ जाएगा.
कातिलों की फेहरिस्त तैयार, रूस के साथ व्यापार करने वालों पर गिरेगी गाज
इस नए कानून में साफ प्रावधान किया गया है कि जो भी देश या विदेशी कंपनियां रूस के साथ किसी भी तरह का व्यापार या ऊर्जा सौदा रखेंगी, अमेरिका उनके खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठाएगा. इस कानून को हरी झंडी दिलाने में सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. ग्राहम ने हाल ही में यूक्रेन की राजधानी कीव का दौरा किया था और वहाँ के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की से मुलाकात की थी. जेलेंस्की ने भी सोशल मीडिया पर अमेरिका के इस कदम की जमकर तारीफ की है. यूक्रेन का कहना है कि रूस पर जितना कड़ा प्रतिबंधों का दबाव बढ़ेगा, युद्ध के मैदान में शांति की गुंजाइश उतनी ही ज्यादा होगी.
ट्रंप के नए मिसाइल लाइसेंस और ईरान तनाव ने बढ़ाई तेल बाजार की आफत
यह कानून ऐसे समय में आ रहा है जब मिडिल ईस्ट में ईरान पर हुए नए सैन्य हमलों की वजह से दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों पर पहले से ही भारी दबाव है. आपको बता दें कि वाशिंगटन ने पिछले महीने ही उस विशेष लाइसेंस की अवधि को खत्म कर दिया था, जिसके तहत कमजोर देशों को समुद्र के रास्ते रूसी तेल खरीदने की थोड़ी ढील मिली हुई थी. दूसरी तरफ, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात के बाद कीव को पैट्रियट मिसाइल इंटरसेप्टर बनाने का लाइसेंस देने का वादा कर दिया है. ट्रंप के इस नए रुख और अमेरिका यूक्रेन की बढ़ती नजदीकी ने मॉस्को की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि दोनों ही देश अब इस 4 साल पुराने युद्ध को अपने अपने तरीके से खत्म करना चाहते हैं.
भारत के लिए पैदा होगी बड़ी कूटनीतिक चुनौती, अब करना होगा तगड़ा मोलभाव
अब बात करते हैं कि इस पूरे मामले से भारत का क्या लेना देना है. दरअसल, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत रूस से सबसे ज्यादा सस्ता कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में सबसे आगे रहा है. ऐसे में अगर अमेरिका का यह नया बिल पास होकर कानून बन जाता है, तो भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के लिए भारी मुसीबत खड़ी हो जाएगी. भारत के सामने या तो सस्ते रूसी तेल का आयात पूरी तरह बंद करने का दबाव होगा, या फिर अमेरिकी प्रतिबंधों और भारी टैरिफ का नुकसान झेलना पड़ेगा. हालांकि, इस बिल में एक राहत की बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर किसी देश को 180 दिनों की छूट (वेवर) देने का अधिकार होगा. इसका मतलब है कि भारत को अपने देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ट्रंप प्रशासन के साथ पर्दे के पीछे बहुत कड़ा और रणनीतिक कूटनीतिक मोलभाव करना पड़ेगा.
