shiromani akali dal nda support: प्रधानमंत्रीl मोदी से मुलाकात के बाद सुखबीर सिंह बादल ने परिसीमन पर अपना रुख बदला है, जो पंजाब में BJP और अकाली दल के दोबारा साथ आने का बड़ा संकेत माना जा रहा है.

shiromani akali dal nda support: संसद में भले ही शिरोमणि अकाली दल यानी SAD के पास सिर्फ एक लोकसभा सांसद है. फिर भी अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल का बदला हुआ रुख भारतीय राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है. परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे बड़े मुद्दों पर जो पार्टी पहले विपक्ष के सुर में सुर मिला रही थी, वह अचानक NDA के समर्थन में खड़ी हो गई है. हैरानी की बात यह है कि यह बदलाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सुखबीर बादल की मुलाकात के महज 24 घंटे के अंदर देखने को मिला. पहली नजर में भले ही यह सिर्फ एक मुद्दे पर समर्थन दिखे, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके पीछे पंजाब में BJP और अकाली दल के पुराने गठबंधन को फिर से जिंदा करने की पटकथा छिपी है.
24 घंटे में बदल गया पूरा सियासी रुख
परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों पर अकाली दल पहले विरोध दर्ज करा रहा था. पंजाब के हितों का हवाला देकर पार्टी विपक्षी खेमे के रुख का समर्थन कर रही थी. लेकिन पीएम मोदी से मुलाकात के बाद अकाली दल ने अपने तेवर पूरी तरह नरम कर लिए. संसद में जब सरकार को संविधान संशोधन जैसे बिल पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, तब हर छोटे-बड़े सहयोगी का समर्थन मायने रखता है. अकाली दल के इस कदम ने न सिर्फ विपक्षी एकजुटता को करारा झटका दिया है, बल्कि संसद में एनडीए का नैतिक और राजनीतिक पलड़ा भी भारी कर दिया है.
2020 की कड़वाहट और मजबूरी का मेल
बीजेपी और अकाली दल का रिश्ता दो दशकों से भी ज्यादा पुराना और मजबूत रहा है. साल 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल एनडीए से अलग हो गया था. इसके बाद दोनों ही पार्टियों ने पंजाब में अपनी राहें अलग कर लीं. लेकिन अलग होने के बाद दोनों को ही भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा. 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सिर्फ 2 और अकाली दल को 3 सीटें मिली थीं. इसके अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में अकाली दल महज 1 सीट जीत पाया और बीजेपी का खाता भी नहीं खुला. इस प्रदर्शन ने दोनों ही दलों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अलग रहकर लड़ाई जीतना नामुमकिन है.
आप को रोकने की साझा रणनीति
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद बीजेपी और अकाली दल दोनों के वजूद पर संकट मंडराने लगा है. अगर दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ती हैं, तो विरोधी वोट आपस में बंट जाते हैं. इसका सीधा फायदा ‘आप’ को मिलता है. पंजाब की सियासत में दोनों पार्टियों का अपना अलग-अलग वोट बैंक है. अकाली दल की पकड़ ग्रामीण इलाकों और पारंपरिक सिख मतदाताओं के बीच मानी जाती है. वहीं बीजेपी का मुख्य आधार शहरी हिंदू वोटरों में है. इन दोनों वोट बैंक को एक साथ लाए बिना आम आदमी पार्टी का मुकाबला करना बेहद मुश्किल है.
पुराने और नए गठबंधन में बड़ा अंतर
अगर भविष्य में बीजेपी और अकाली दल फिर से हाथ मिलाते हैं, तो यह पुरानी शर्तों पर नहीं होगा. 1997 से 2020 के बीच बने गठबंधन में अकाली दल बड़े भाई की भूमिका में था और बीजेपी को कम सीटें मिलती थीं. लेकिन अब स्थितियां काफी बदल चुकी हैं. अकाली दल अंदरूनी बगावत और टूट का सामना कर रहा है, जबकि बीजेपी ने पंजाब में अकेले लड़कर अपना वोट शेयर बढ़ाया है. ऐसे में अगर नया समझौता होता है, तो सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर बीजेपी अपनी शर्तों को ज्यादा मजबूती से सामने रखेगी.
1 सांसद वाली पार्टी का असली वजन
भले ही आंकड़ों के हिसाब से अकाली दल का 1 सांसद संसद में बहुत बड़ा उलटफेर न कर सके, लेकिन राजनीति केवल संख्याओं का खेल नहीं होती. सुखबीर बादल के इस यू-टर्न ने यह संदेश दे दिया है कि क्षेत्रीय पार्टियां अपने फायदे और भविष्य को देखकर फैसले लेती हैं. आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और अकाली दल का करीब आना राज्य की चुनावी बिसात को पूरी तरह बदल सकता है. भले ही आधिकारिक ऐलान होना अभी बाकी है, लेकिन इस एक कदम ने पंजाब से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक समीकरणों को गर्मा दिया है.
