mecca pact saudi arabia pakistan: इस खबर में जानिए सऊदी अरब पर हूती हमले के बाद पाकिस्तान के बैकफुट पर आने की असली वजह। मक्का पैक्ट के वादों के बावजूद शहबाज-मुनीर सेना भेजने से क्यों डरे? जानिए ईरान के खौफ और कंगाली से जुड़ी इनसाइड स्टोरी।

mecca pact saudi arabia pakistan: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किए गए बड़े-बड़े दावे अक्सर वक्त आने पर हवा हो जाते हैं. कुछ ऐसा ही इस समय पाकिस्तान के साथ देखने को मिल रहा है. अभी हाल ही में यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर एक बड़ा और भयंकर हमला बोल दिया. इस हमले में कई लोग घायल हुए और काफी नुकसान भी हुआ. इसके तुरंत बाद ही पूरी दुनिया की नजरें पाकिस्तान पर टिक गईं. वजह यह थी कि कुछ ही समय पहले सऊदी, पाकिस्तान और तुर्की ने मिलकर ‘मक्का पैक्ट’ नाम का एक बड़ा रक्षा समझौता किया था. लेकिन जब सऊदी को मदद की जरूरत पड़ी, तो पाकिस्तान सिर्फ बयानों तक ही सिमट कर रह गया.
क्या था यह बहुचर्चित ‘मक्का पैक्ट’?
मक्का पैक्ट को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर ने काफी ढोल पीटा था. इस समझौते को मुस्लिम देशों के अपने ‘नाटो’ के रूप में देखा जा रहा था. इसमें यह बात कही गई थी कि तीनों में से किसी भी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा. जब यह संधि हुई थी, तब पाकिस्तान ने इसे अपनी बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत बताया था. लेकिन हूतियों के हमले के बाद जब पाकिस्तान ने अपनी सेना यमन नहीं भेजी, तो सोशल मीडिया पर उसकी जमकर फजीहत होने लगी. लोग अब पूछ रहे हैं कि मुसीबत के समय यह समझौता कहां गायब हो गया.
कागजी शेर साबित हुआ रक्षा समझौता
विशेषज्ञों का मानना है कि मक्का पैक्ट असल में एक कागजी शेर ही साबित हुआ है. इस समझौते की भाषा में कई तरह की कमियां और उलझनें रखी गई थीं. इसमें कहीं भी यह साफ नहीं लिखा था कि हमला होने पर सेना तुरंत मैदान में उतारी जाएगी. इसके अलावा यह भी तय नहीं था कि कौन सा देश किस तरह की सैन्य मदद भेजेगा. यही वजह है कि सऊदी पर इतना बड़ा हमला होने के बावजूद पाकिस्तानी सेना वहीं की वहीं बैठी रह गई. यह समझौता किसी भी देश को जबरन युद्ध में झोंकने की ताकत नहीं रखता था.
सऊदी में मौजूदगी के बावजूद हिचकिचाहट
हकीकत यह भी है कि सऊदी अरब में पहले से ही करीब आठ हजार पाकिस्तानी सैनिक तैनात हैं. इसके साथ ही वहां पाकिस्तानी फाइटर जेट्स और एयर डिफेंस सिस्टम भी मौजूद हैं. पाकिस्तानी सेना लंबे समय से सऊदी के जवानों को ट्रेनिंग भी देती आई है. इसके बावजूद शहबाज शरीफ और असीम मुनीर हूतियों से सीधा मुकाबला करने से डर रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा पाकिस्तान वहां और एयर डिफेंस या खुफिया मदद भेज सकता है. लेकिन सीधे तौर पर युद्ध के मैदान में उतरने की हिम्मत पाकिस्तान की सेना नहीं दिखा पा रही है.
ईरान का खौफ और कंगाली की मजबूरी
पाकिस्तान के इस तरह पीछे हटने के पीछे कुछ बहुत बड़े कारण छिपे हैं. सबसे बड़ा डर ईरान का है, क्योंकि यमन के हूतियों को पीछे से ईरान का समर्थन हासिल है. पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है और अगर वह हूतियों पर हमला करता है, तो ईरान से उसकी सीधी दुश्मनी हो जाएगी. दूसरा बड़ा कारण पाकिस्तान की बेहद खराब आर्थिक स्थिति है. कंगाली से जूझ रहे पाकिस्तान के पास किसी नए युद्ध का खर्च उठाने का बजट ही नहीं है. इसके अलावा, इस रक्षा समझौते में पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का भी कोई लेना-देना नहीं है.
दोराहे पर फंसी पाकिस्तानी सरकार
आज के समय में पाकिस्तान एक बहुत ही मुश्किल मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है. उसे अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए सऊदी अरब से मिलने वाले पैसों और सस्ते तेल की बहुत जरूरत है. इसके लिए उसे सऊदी का वफादार बनकर भी दिखाना है. वहीं दूसरी तरफ, वह ईरान से दुश्मनी मोल लेकर अपनी सुरक्षा को खतरे में भी नहीं डालना चाहता. यही कारण है कि शहबाज शरीफ सिर्फ सोशल मीडिया पर बयान जारी करके अपना पल्ला झाड़ रहे हैं. इस पूरी घटना ने दुनिया के सामने मक्का पैक्ट का असल सच लाकर खड़ा कर दिया है.
