Crude Oil Price Hike: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी के बावजूद केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है. कच्चे तेल के 115 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने से तेल कंपनियों को रोजाना 530 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है, लेकिन सरकार का प्राथमिक उद्देश्य देश में ऊर्जा सुरक्षा और ईंधन की स्थिर आपूर्ति बनाए रखना है.

Crude Oil Price Hike: दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई तेजी के बाद पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की अटकलें तेज हो गई हैं. हालांकि केंद्र सरकार ने इन सभी चर्चाओं पर विराम लगा दिया है. सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि फिलहाल ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का कोई भी प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है. इस समय सरकार का पूरा ध्यान देश में ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने और आम जनता तक बिना किसी रुकावट के ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित करने पर केंद्रित है.
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और भारत पर असर
वैश्विक बाजार में भारतीय कच्चे तेल का बास्केट बढ़कर 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. सितंबर महीने का औसत मूल्य भी 114 डॉलर प्रति बैरल से अधिक दर्ज किया गया है. अमेरिका में होने वाले चुनावों और वैश्विक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है. इससे भारत के तेल आयात बिल पर भारी दबाव पड़ रहा है. इसके बावजूद सरकार ने घरेलू स्तर पर खुदरा कीमतों को स्थिर बनाए रखने का फैसला किया है.
तेल कंपनियों को रोजाना 530 करोड़ रुपये का घाटा
कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद खुदरा कीमतें न बढ़ाए जाने से सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर बड़ा वित्तीय बोझ पड़ रहा है. रेटिंग एजेंसी इक्रा की रिपोर्ट के मुताबिक तेल कंपनियों को हर दिन करीब 530 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है. पेट्रोल पर करीब 8 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 9 रुपये प्रति लीटर का घाटा हो रहा है. इसके अलावा एलपीजी सिलेंडर पर भी लगभग 300 रुपये प्रति सिलेंडर की अंडर-रिकवरी दर्ज की जा रही है.
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और सप्लाई चेन का संकट
तेल की कीमतों में इस भारी तेजी की मुख्य वजह वैश्विक सप्लाई चेन का प्रभावित होना है. होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होने वाली तेल टैंकरों की आवाजाही में रुकावट आने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति घट गई है. सरकार इस रास्ते से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बातचीत कर रही है. इसके साथ ही भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखने और इराक व सऊदी अरब जैसे देशों से आपूर्ति बढ़ाने के विकल्पों पर काम कर रहा है.
तेल कंपनियों के लिए सरकारी राहत की संभावना
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम लंबे समय तक उच्च स्तर पर बने रहते हैं, तो सरकार को एक बड़ा फैसला लेना पड़ सकता है. तेल कंपनियों को वित्तीय संकट से उबारने के लिए सरकार बाद के चरण में आर्थिक पैकेज या सब्सिडी देने पर विचार कर सकती है. वर्तमान में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियां इस घाटे को खुद वहन कर रही हैं. सरकार उनकी वित्तीय स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए रणनीतिक योजना बना रही है.
तीन मुख्य प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती
मौजूदा परिस्थितियों में सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां एक साथ खड़ी हैं. पहली चुनौती देश में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखकर आम जनता को महंगाई से बचाना है. दूसरी प्राथमिकता सरकारी तेल कंपनियों को वित्तीय तबाही से सुरक्षित रखना है. तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दुनिया भर में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच देश में ईंधन की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखना है. सरकार इन तीनों मोर्चों पर एक साथ संतुलन साधने की कोशिश कर रही है.
