PoK Violence News: PoK में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों और मानवाधिकार हनन पर बीबीसी व सीएनएन जैसे बड़े पश्चिमी मीडिया घरानों की चुप्पी ने उनके दोहरे रवैये को बेनकाब कर दिया है.

PoK Violence News: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में इस समय हालात बेहद खराब हैं। वहां की जनता पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों से तंग आकर सड़कों पर उतर आई है। सेना आम नागरिकों पर बल प्रयोग कर रही है और लोग मदद की गुहार लगा रहे हैं। इस खूनी तांडव के बीच पश्चिमी मीडिया की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। जो विदेशी मीडिया भारत के छोटे-बड़े मुद्दों पर बड़ी-बड़ी बहसें चलाता है, वही मीडिया PoK में हो रहे मानवाधिकारों के हनन पर पूरी तरह खामोश बैठा है।
PoK में बिगड़ते हालात और दुनिया की चुप्पी
PoK में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की बर्बरता इस कदर बढ़ चुकी है कि अब लोगों के सब्र का बांध टूट गया है। वहां की जनता बुनियादी अधिकारों और सुरक्षा की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही है। हालात इतने बिगड़ गए कि संयुक्त राष्ट्र और एम्नेस्टी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी चिंता जतानी पड़ी। उन्होंने पाकिस्तान सरकार को आम नागरिकों पर अत्याचार रोकने की चेतावनी दी है। इसके बावजूद बड़े विदेशी मीडिया घराने इस गंभीर खबर को नजरअंदाज कर रहे हैं।
बीबीसी और सीएनएन का दोहरा रवैया
अंतरराष्ट्रीय मीडिया के इस रवैये को लेकर जानकारों में काफी नाराजगी है। बीबीसी, सीएनएन, फॉक्स न्यूज और फ्रांस 24 जैसे बड़े मीडिया चैनलों ने PoK की हिंसा पर ना के बराबर रिपोर्टिंग की है। जब भारत में दिल्ली के CJP प्रदर्शन जैसी घटनाएं होती हैं, तो ये मीडिया हाउस दिन-रात कवरेज दिखाते हैं। लेकिन जब PoK में बेकसूर लोगों पर गोलियां और लाठियां बरसाई जाती हैं, तब इनकी निष्पक्षता गायब हो जाती है। यह साफ तौर पर पश्चिमी मीडिया के दोहरे मापदंड को दिखाता है।
कूटनीतिक दबाव या रणनीतिक चुप्पी?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुप्पी के पीछे भू-राजनीतिक और कूटनीतिक कारण हो सकते हैं। पाकिस्तान के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ पुराने सैन्य संबंध रहे हैं। इसी वजह से पश्चिमी मीडिया अक्सर पाकिस्तानी सेना के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने से बचता है। हालांकि, किसी आधिकारिक नीति का सीधा सबूत नहीं है, लेकिन यह पैटर्न सवाल जरूर उठाता है। राहत की बात यह है कि ब्रिटेन के कुछ सांसदों ने इस अनदेखी के खिलाफ आवाज उठाई है और दुनिया से ध्यान देने की अपील की है।
भारत और PoK की कवरेज में साफ अंतर
इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया के दोगलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है। दिल्ली में हुए प्रदर्शन को जिस तरह वैश्विक मीडिया ने मुख्य सुर्खियों में जगह दी, उसकी तुलना में PoK के दर्द को पूरी तरह से दबा दिया गया। आलोचकों का कहना है कि पश्चिमी मीडिया के लिए मानवाधिकार का मुद्दा सिर्फ अपनी सहूलियत का जरिया बन गया है। भारत के मामले में हर छोटी बात को बड़ा बनाने वाला मीडिया, पाकिस्तान के जुल्मों पर आंखें मूंद लेता है।
