Supreme Court Sanction: सुप्रीम कोर्ट ने एक डॉक्टर के खिलाफ राजनीतिक दबाव में अभियोजन की मंजूरी देने पर राजस्थान सरकार को फटकार लगाते हुए हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और राज्य सरकार पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया.

Supreme Court Sanction: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में राजस्थान सरकार को जोरदार फटकार लगाई है. अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी पर केस चलाने की इजाजत राजनीतिक दबाव में नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने कहा कि कानून में अभियोजन की मंजूरी का नियम इसलिए बनाया गया है ताकि अधिकारियों को झूठे मुकदमों से बचाया जा सके. अगर सरकार पहले मंजूरी देने से मना करे और बाद में राजनीतिक दबाव में अपना फैसला बदल ले, तो यह कानून का मजाक उड़ाने जैसा है.
क्या बोले सुप्रीम कोर्ट के जज?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि केस चलाने की इजाजत देने का फैसला कोई खेल नहीं है. अगर सरकार बार-बार अपना मन बदलती है, तो इसका साफ मतलब है कि उस पर बाहर से कोई अनुचित दबाव बनाया जा रहा है. इस मामले में साफ दिखता है कि फैसला लेने में राजनीतिक निर्देशों का असर रहा है, जो कि पूरी तरह गलत है.
हाई कोर्ट के फैसले को रखा बरकरार
शीर्ष अदालत ने राजस्थान सरकार की अपील को खारिज कर दिया. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस फैसले पर मुहर लगा दी, जिसमें केस चलाने की मंजूरी को रद्द किया गया था. अदालत ने राज्य सरकार की लापरवाही पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया. कोर्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री कार्यालय के बेवजह दखल के कारण एक सरकारी डॉक्टर को बिना किसी वजह के सालों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़े.
जानिए क्या था पूरा मामला?
यह पूरा मामला एक सरकारी डॉक्टर से जुड़ा हुआ है. डॉक्टर पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने घुटने के ऑपरेशन के नाम पर मरीज से 5 से 6 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी. जबकि मरीज का इलाज सरकारी योजना के तहत मुफ्त होना था. इसके बाद भ्रष्टाचार निवारण टीम ने छापेमारी की और डॉक्टर के सरकारी घर की टेबल की दराज से 2,000 रुपये बरामद किए. इसके बाद डॉक्टर के खिलाफ केस चलाने की फाइल आगे बढ़ाई गई थी.
सरकार ने पहले क्यों किया था इनकार?
मार्च 2018 में राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग ने डॉक्टर पर केस चलाने से साफ मना कर दिया था. विभाग ने कहा था कि फोन रिकॉर्डिंग से रिश्वत की बात साबित नहीं होती. साथ ही जिस दराज से पैसे मिले, उसका ताला तोड़कर जब्ती की गई थी, जिससे पूरी कार्रवाई शक के घेरे में आ गई. विभाग ने यह भी नोट किया था कि राजनीतिक दल के कुछ लोगों ने पब्लिसिटी के लिए डॉक्टर को फंसाया था. न तो मरीज और न ही उसके परिवार ने कोई शिकायत दर्ज कराई थी.
मुख्यमंत्री कार्यालय के कहने पर बदला गया फैसला
कार्मिक विभाग के फैसले को राज्य के मुख्य सचिव ने भी सही माना था. लेकिन इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव ने इस मामले पर दोबारा विचार करने को कहा. इसके बाद सरकार ने अचानक अपना फैसला पलट दिया और डॉक्टर पर केस चलाने की मंजूरी दे दी. हाई कोर्ट ने इस फैसले को गैर-कानूनी बताते हुए रद्द कर दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट की बात को सही मानते हुए सरकार को सख्त संदेश दिया है.
