Supreme Court Maintenance: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति ठोस सबूतों के साथ पत्नी के व्यभिचार (अफेयर) को शुरुआती चरण में ही साबित कर दे, तो पत्नी को अंतरिम गुजारा-भत्ता पाने का कोई हक नहीं होगा.

Supreme Court Maintenance: सुप्रीम कोर्ट ने देश के पारिवारिक मुकदमों से जुड़ा एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि अगर किसी पत्नी पर अफेयर के आरोप शुरुआती जांच में ही सही नजर आते हैं, तो उसे अंतरिम भरण-पोषण (मेंटिनेंस) पाने का कोई हक नहीं होगा. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस पुराने फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि मुकदमे का अंतिम फैसला आने तक पत्नी को गुजारा-भत्ते से दूर नहीं रखा जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर सबूत पुख्ता हों, तो शुरुआती स्तर पर ही अंतरिम भरण-पोषण पर रोक लगाई जा सकती है.
कानून का नियम: साबित करना होगा आरोप
अदालत ने सुनवाई के दौरान भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(4) का हवाला दिया. कोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी किसी गैर-पुरुष के साथ रिश्ते में रह रही है या बिना किसी वाजिब वजह के पति से अलग रह रही है, तो वह गुजारा-भत्ता नहीं माँग सकती. हालांकि इसके लिए केवल आरोप लगा देना ही काफी नहीं होगा. पति को कोर्ट में ऐसे पुख्ता और मजबूत सबूत पेश करने होंगे, जो पहली ही नजर (प्रथम दृष्टया) में आरोप को सही साबित कर सकें. अगर शुरुआती चरण में ही ठोस सबूत मिल जाते हैं, तो कोर्ट अंतरिम राहत की अर्जी खारिज कर सकता है.
केस में पेश किए गए 92 वीडियो
यह पूरा मामला उदयपुर का है, जहाँ साल 2014 में एक शादी हुई थी. कुछ ही समय बाद दोनों के बीच दूरियाँ आ गईं और मई 2020 में महिला अपना ससुराल छोड़कर अलग रहने लगी. बाद में महिला ने कोर्ट में गुजारा-भत्ते के लिए केस दाखिल किया. इसके जवाब में पति ने धारा 125(4) के तहत अर्जी लगाई और आरोप लगाया कि उसकी पत्नी का किसी और के साथ संबंध है. अपने दावे को साबित करने के लिए पति ने अदालत में कई तस्वीरें और 92 वीडियो पेश किए. इन सबूतों के आधार पर पति ने अंतरिम गुजारा-भत्ता देने का कड़ा विरोध किया था.
प्राइवेट जासूसों पर भी कोर्ट की टिप्पणी
पति की ओर से कोर्ट में जमा कराए गए 92 वीडियो को देखकर पीठ ने आशंका जताई कि यह सारा डेटा किसी प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी की मदद से जुटाया गया हो सकता है. इस बिंदु को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में प्राइवेट जांच एजेंसियों के कामकाज को कंट्रोल करने के लिए सख्त कानून बनने चाहिए. कोर्ट ने माना कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और परिस्थितियों को जाँचने में वक्त ज़रूर लगता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ठोस सबूतों को दरकिनार कर अंतिम फैसले तक इंतज़ार किया जाए.
हाई कोर्ट के फैसले में गलती
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट दोनों से इस मामले में बड़ी गलती हुई थी. निचली अदालतों का यह सोचना गलत था कि व्यभिचार से जुड़े सवाल पर सिर्फ अंतिम सुनवाई के वक्त ही फैसला लिया जा सकता है. शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर कोर्ट हर बार अंतिम फैसले तक इंतज़ार करेगी, तो कानून में दिए गए प्रावधानों का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा. इसीलिए अगर पति शुरुआत में ही ठोस दस्तावेज़ और वीडियो जैसा सबूत देता है, तो जज को उसी वक़्त अंतरिम मेंटिनेंस की अर्जी खारिज करने का अधिकार है.
क्या है सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सीधा मतलब?
इस फैसले से अब उन पतियों को बड़ी राहत मिलेगी, जो अपनी पत्नी के खिलाफ एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के ठोस सबूत जुटा चुके हैं. अब उन्हें मुकदमे के बरसों-बरस खिंचने और अंतिम फैसला आने का लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा. अगर उनके पास पहली नजर में सच साबित करने वाले विश्वसनीय वीडियो, चैट या फोटोग्राफ मौजूद हैं, तो वे कोर्ट के शुरुआती चरण में ही अंतरिम भरण-पोषण देने से बच सकते हैं. यह फैसला देश भर की फैमिली कोर्ट्स के लिए एक नज़ीर साबित होगा.
