UPI transaction charges new rules: लोकसभा में पारित नए टैक्स संशोधन बिल से यूपीआई लेनदेन पर चार्ज का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन आम लोगों के बीच होने वाले करीब 71 प्रतिशत मुफ्त भुगतानों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा.

UPI transaction charges new rules: डिजिटल लेनदेन का इस्तेमाल करने वालों के लिए एक बड़ी खबर सामने आ रही है. लोकसभा ने हाल ही में टैक्स से जुड़े कानून में संशोधन का बिल पास कर दिया है. इससे यूनिफायड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई से होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने का रास्ता साफ होता दिख रहा है. हालांकि राहत की बात यह है कि करीब 71 प्रतिशत लेनदेन इस शुल्क के दायरे से पूरी तरह बाहर रह सकते हैं. संसद से पारित बिल में यह साफ नहीं किया गया है कि कितना चार्ज लगेगा और किस रकम के ऊपर लगेगा. यह फैसला आगे चलकर भारतीय रिजर्व बैंक और एनपीसीआई मिलकर तय करेंगे.
आम लोगों के लेनदेन पर नहीं पड़ेगा कोई असर
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक आम लोगों को इससे घबराने की जरूरत नहीं है. अगर आप अपने दोस्त, रिश्तेदार या किसी परिचित को पैसे ट्रांसफर करते हैं, तो उस पर कोई चार्ज नहीं लगेगा. इसे तकनीकी भाषा में पर्सन टू पर्सन यानी पीटूपी ट्रांसफर कहा जाता है. चार्ज सिर्फ दुकानदारों या कारोबारियों को किए जाने वाले भुगतान यानी पर्सन टू मर्चेंट लेनदेन पर लग सकता है. इसका मतलब यह है कि रोजमर्रा के व्यक्तिगत लेनदेन पहले की तरह पूरी तरह मुफ्त बने रहेंगे.
जानिए कितनी रकम के भुगतान पर लग सकता है चार्ज
वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार मर्चेंट स्तर पर होने वाले ज्यादातर लेनदेन बहुत छोटे होते हैं. पिछले वित्त वर्ष में कुल मर्चेंट भुगतानों में से 59 प्रतिशत ट्रांजेक्शन 500 रुपये से कम के थे. वहीं 2000 रुपये से अधिक के मर्चेंट ट्रांजेक्शन केवल चार प्रतिशत ही दर्ज किए गए. सूत्रों का कहना है कि 2000 रुपये से अधिक के मर्चेंट भुगतान पर ही शुल्क लगाने की तैयारी चल रही है. ऐसे में छोटे दुकानदारों और सब्जी-रेहड़ी वालों को किए जाने वाले छोटे पेमेंट पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
आंकड़ों की जुबानी समझें यूपीआई का पूरा गणित
पिछले वित्त वर्ष में देश के लोगों ने यूपीआई के जरिए कुल 314 लाख करोड़ रुपये का डिजिटल लेनदेन किया. इसमें कुल ट्रांजेक्शन की संख्या करीब 24,161 करोड़ से भी ज्यादा रही. इस भारी-भरकम राशि में से लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा आम लोगों के आपस में किए गए लेनदेन का था. चूंकि आम लोगों के ट्रांसफर को शुल्क से मुक्त रखा जाएगा, इसलिए 314 लाख करोड़ रुपये की बड़ी रकम का बहुत बड़ा हिस्सा सुरक्षित रहेगा. सिर्फ बाकी बचे 29 प्रतिशत मर्चेंट ट्रांजेक्शन ही नए नियमों के तहत आ सकते हैं.
बैंकों पर बढ़ रहा था रखरखाव का भारी आर्थिक बोझ
वर्तमान में देश के 700 से ज्यादा बैंक और वित्तीय संस्थान लोगों को मुफ्त यूपीआई की सेवा दे रहे हैं. लेकिन इस पूरी प्रणाली को बिना रुकावट चलाने के लिए बैंकों को हर साल लगभग 10 हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं. पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट 2007 में संशोधन इसीलिए किया जा रहा है. नया बिल बैंकों को यह कानूनी अधिकार देगा कि वे इस बड़े बुनियादी ढांचे को बनाए रखने के लिए मामूली शुल्क तय कर सकें.
साइबर सुरक्षा और बेहतर नेटवर्क पर खर्च होगी यह रकम
यूपीआई पर लगने वाले इस संभावित शुल्क से जुटाया गया पैसा सीधे बैंकों की सेवा सुधारने में लगाया जाएगा. आज के समय में डिजिटल धोखाधड़ी और सर्वर डाउन होने की समस्याएं काफी बढ़ गई हैं. शुल्क से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल साइबर सुरक्षा को मजबूत करने और सर्वर की क्षमता बढ़ाने में होगा. इससे आम ग्राहकों को नेटवर्क फेल होने जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलेगी और उनका पैसा ऑनलाइन लेनदेन में पूरी तरह सुरक्षित रहेगा.
