Rahul Gandhi new political strategy: 2024 चुनाव नतीजों और चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद राहुल गांधी राजनीति का एजेंडा तय करते दिख रहे हैं. जानिए कैसे बदला भारतीय सियासत का पूरा नैरेटिव.

Rahul Gandhi new political strategy: भारतीय राजनीति की हवा का रुख अब धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है. 6 और 7 अक्टूबर को जिस तरह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी चुनाव आयोग के खिलाफ सड़कों पर उतरे, उसने पूरी सियासत को गरमा दिया है. एक दौर था जब भारतीय जनता पार्टी लगातार राहुल गांधी पर वार करती थी और कांग्रेस को हर मुद्दे पर सफाई देनी पड़ती थी. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद से तस्वीर काफी बदल चुकी है. 99 सीटें जीतकर नेता प्रतिपक्ष बने राहुल गांधी अब सीधे सरकार से तीखे सवाल पूछ रहे हैं. आलम यह है कि अब राहुल गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मुद्दा तय करते हैं और बीजेपी व चुनाव आयोग को उस पर सफाई देने के लिए सामने आना पड़ता है. आइए समझते हैं कि राहुल गांधी की राजनीति में यह बड़ा बदलाव कैसे आया और क्या बीजेपी वाकई नैरेटिव की इस जंग में बैकफुट पर दिख रही है.
2024 के चुनावी नतीजों और ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से बदला हवा का रुख
राहुल गांधी की इस नई छवि की नींव 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों और उनकी यात्राओं से पड़ी है. ‘400 पार’ का नारा देने वाली बीजेपी जब 240 सीटों पर सिमट गई, तो विपक्ष का हौसला कई गुना बढ़ गया. राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष का संवैधानिक पद मिला, जिससे उन्हें संसद में सीधे सरकार को घेरने की बड़ी ताकत मिल गई. इसके अलावा ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और ‘न्याय यात्रा’ के जरिए उन्होंने सीधे आम लोगों से जुड़ने का रास्ता चुना. अब वे केवल पीएम मोदी पर सीधा जुबानी हमला नहीं करते. वे पहले जमीनी मुद्दे चुनते हैं, फिर उस वर्ग के बीच पहुंचते हैं और उसी मुद्दे को सड़क से लेकर संसद तक पुरजोर तरीके से उठाते हैं.
जाति की राजनीति से हटकर युवाओं और Gen Z के मुद्दों पर फोकस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी अब उन मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो सीधे युवाओं को छूते हैं. जैसे कि बेरोजगारी, परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक जैसे मामले. उन्होंने Gen Z और छात्रों की आवाज उठाने के लिए ‘छात्रों की गूंज’ नाम का एक मंच भी शुरू किया है. राहुल अब जातिगत जनगणना के साथ-साथ मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास युवाओं को भी जोड़ रहे हैं. क्योंकि परीक्षा रद्द होने या नौकरियां न मिलने पर नुकसान हर वर्ग और हर जाति के छात्र का समान रूप से होता है. राहुल गांधी इसी युवा वर्ग को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनाने में जुटे हैं.
महाराष्ट्र चुनाव के बाद से चुनाव आयोग पर लगातार तीखे सवाल
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाकर सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं. उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव के आंकड़ों में गड़बड़ी का मुद्दा उठाया था. इसके बाद अगस्त 2025 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उन्होंने कर्नाटक की एक सीट पर लाखों वोटों की हेराफेरी का गंभीर आरोप लगाया. जब चुनाव आयोग ने उनसे हलफनामा देने को कहा, तो वे पीछे नहीं हटे. जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से रिपोर्ट मांगी, तो विपक्ष का हौसला और बढ़ गया. राहुल अब केवल राजनीतिक आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि सीधे व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
अक्टूबर के प्रदर्शन में प्रियंका का साथ और सड़क पर उतरने का तेवर
अक्टूबर में चुनाव आयोग के खिलाफ हुए प्रदर्शन में कांग्रेस का एक नया और आक्रामक रूप सामने आया. 6 और 7 अक्टूबर को राहुल गांधी के साथ प्रियंका गांधी भी कंधे से कंधा मिलाकर मैदान में दिखीं. जंतर-मंतर पर पुलिस द्वारा रोके जाने पर प्रियंका गांधी का संविधान हाथ में लेकर सड़क पर लेटना और राहुल गांधी का सड़क पर घंटों बैठ जाना, यह साफ बताता है कि कांग्रेस अब पूरी तरह सड़क की लड़ाई के मूड में है. राहुल जहां संस्थागत और बड़े मुद्दे उठा रहे हैं, वहीं प्रियंका जनसंपर्क और आक्रामक प्रदर्शन के जरिए कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक रही हैं.
क्या वाकई नैरेटिव की जंग में बैकफुट पर दिख रही है बीजेपी?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी बैकफुट पर आ गई है? इसका जवाब पूरी तरह ‘हां’ नहीं हो सकता, क्योंकि केंद्र में 240 सीटों के साथ बीजेपी की मजबूत सरकार है और उसका संगठन बेहद विशाल है. लेकिन राजनीति में सत्ता में रहने से ज्यादा जरूरी नैरेटिव की लड़ाई जीतना होता है. इस वक्त राहुल गांधी राजनीति का एजेंडा खुद तय कर रहे हैं. पहले बीजेपी हमला करती थी और कांग्रेस बचाव में सफाई देती थी. अब राहुल गांधी सवाल उठाते हैं और बीजेपी व चुनाव आयोग को सामने आकर जवाब देना पड़ता है. राजनीति में आया यही सबसे बड़ा बदलाव है जो कांग्रेस को मजबूत बना रहा है.
