6 फरवरी दिन शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय द्वारा एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया है. दरअसल, कोर्ट ने 17 साल की नाबालिग लड़की के 30 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति को दे दिया गया है. साथ ही उच्चतम न्यायालय ने बॉबे हाईकोर्ट, जिसमें किसी भी महिला को गर्भावस्था को जारी और पैदा होने के बाद उसको गोद दे देने की बात की गई थी. उस सुझाव को खारिज कर दिया है.
चाहें कोई भी महिला हो उसकी इच्छा जरूरी
न्यायालय ने साफ कहा है कि यह मामला इस बात पर निर्भर ही नहीं है कि गर्भधारण सहमति से बना है या किसी भी तरीके के दुष्कर्म या जोर जबरदस्ती से बना हो. यह फैसला महिला का है. वह नाबालिग हो या कोई और महिला. अगर वह बच्चे को जन्म देने का इरादा नहीं रखती है. तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता है.
मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से आहात
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी महिला के बिना मर्जी के उसको बच्चे को जन्म देने के प्रेशर करना उसको मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से गंभीर आघात कर सकता है. साथ ही साथ उसे समाज में कलंक लगने वाली बातों का भी सामना करना पड़ सकता है.
J.J अस्पताल को दिया जिम्मा
दरअसल, कोर्ट ने यह फैसला तब लिया है. जब मेडिकल बोर्ड ने यह निश्चित कर दिया कि गर्भ समाप्त करने पर किसी भी प्रकार को जोखिम नहीं है. इसी कारण और सभी चीजों को देखते हुए सरकार द्वारा गर्भपात कराने का फैसला दिया है. कोर्ट ने महिला की प्रजनन स्वायत्तता को सर्वोपरी रख कहा है कि अंत में फैसला मां का होगा कि वह इस बच्चे को जन्म देगी या नहीं. मुबंई के JJ अस्पताल को गर्भावस्था कराने का निर्देश जारी किया है.
कितनी हफ्तों में कराया जा सकता है गर्भपात
अगर महिला को किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं थी या मर्जी से संबध बनाने पर गर्भधारण हुआ था तो ऐसी स्थिति में महिला 20 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करवा सकती है.
वहीं, किसी जोर जबरदस्ती, दुष्कर्म के बाद, विधवा, नाबालिग या औरत के दिव्यांग या किसी गंभीर बीमारी होने वाली महिला के लिए समय सीमा 24 सप्ताह की निर्धारित की गई है. हालांकि, अगर महिला के जीवन को किसी भी तरीके का खतरा हो तो ऐसी स्थिति में किसी भी समय में गर्भपात को कराया जा सकता है.
