china cpec balochistan exploitation: बेहिसाब कुदरती संसाधनों से भरा होने के बावजूद बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे गरीब प्रांत है, जिसका बड़ा आर्थिक फायदा चीन और पाकिस्तान सरकार उठा रहे हैं.

china cpec balochistan exploitation: जिस जमीन के सीने में सोना, तांबा और प्राकृतिक गैस का बेहिसाब खजाना छुपा हो, वहां के आधे लोग दाने-दाने को तरसें तो यह बड़ा विरोधाभास लगता है. पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत आज इसी कड़वे सच से जूझ रहा है. कड़े सैन्य अभियानों के बावजूद यहां की जनता का गुस्सा शांत नहीं हो रहा है. अफगान डायस्पोरा नेटवर्क की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की सरकार बलूचिस्तान को सिर्फ एक सुरक्षा समस्या मानती है. वह इसके पीछे की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वजहों को पूरी तरह अनदेखा कर रही है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि समृद्ध खनिजों से भरा यह प्रांत आज बदहाली की कगार पर क्यों खड़ा है.
खनिजों से भरी है बलूचिस्तान की धरती
बलूचिस्तान कुदरती संसाधनों के मामले में बेहद धनी प्रांत है. यहां का सुई (Sui) गैस क्षेत्र पूरे पाकिस्तान के उद्योगों और घरों को ऊर्जा देता है. चागाई जिले में रेको डिक और सैंदक जैसी दुनिया की सबसे बड़ी सोने और तांबे की खदानें मौजूद हैं. इसके अलावा, पाकिस्तान के सीमेंट कारखानों के लिए कोयला और स्टील उद्योग के लिए 90% से अधिक क्रोमाइट यहीं से मिलता है. समुद्र किनारे स्थित ग्वादर पोर्ट चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का सबसे अहम हिस्सा है. लेकिन इतने विशाल खजाने के बावजूद बलूचिस्तान की 47% आबादी बेहद गरीबी में जीने को मजबूर है.
बलूच जनता में भारी आक्रोश क्यों?
स्थानीय बलूच लोगों में सबसे बड़ा गुस्सा इस बात का है कि उनकी जमीन की कमाई पाकिस्तान का पंजाब प्रांत और चीन मिलकर खा रहे हैं. जिस गैस से पूरा पाकिस्तान रोशन होता है, उसी बलूचिस्तान के गांवों में बिजली और पीने का साफ पानी तक नहीं है. युवाओं के पास न नौकरियां हैं और न ही बेहतर शिक्षा व्यवस्था. जब स्थानीय लोग अपने हक और विकास की मांग करते हैं, तो सरकार बातचीत के बजाय सेना भेजकर आवाज दबाने की कोशिश करती है. इसी वजह से वहां असंतोष और हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है.
चीन कैसे लूट रहा है बलूचिस्तान की मलाई?
बलूचिस्तान के संसाधनों का सबसे बड़ा हिस्सा चीन के पास जा रहा है. चागाई जिले के सैंदक प्रोजेक्ट में सोना और तांबा निकालने का काम एक चीनी कंपनी कर रही है. वहां से निकलने वाला लगभग सारा माल सीधे चीन भेज दिया जाता है. कुछ अध्ययनों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के मुनाफे का 80% हिस्सा चीन को जाता है, जबकि बलूचिस्तान को सिर्फ 2% रॉयल्टी ही मिलती है. इसी तरह रणनीतिक रूप से अहम ग्वादर बंदरगाह को चलाने का पूरा अधिकार भी एक चीनी कंपनी को दे दिया गया है. बलूच राष्ट्रवादियों का कहना है कि यह उनकी जमीन का सीधा शोषण है.
बंदूकों के दम पर नहीं आएगी शांति
पाकिस्तान सरकार अक्सर ‘ऑपरेशन शाबान’ जैसे बड़े सैन्य अभियान चलाकर उग्रवादियों को खत्म करने का दावा करती है. लेकिन जानकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि बंदूकों के दम पर कभी स्थायी शांति नहीं आ सकती. हाल ही में ‘बलोच रिपब्लिकन गार्ड्स’ ने नासिराबाद में पावर प्लांट के दो बड़े टावरों को धमाके से उड़ा दिया. यह घटना साफ बताती है कि कड़े पहरे के बावजूद बलूचिस्तान में उग्रवाद खत्म नहीं हो रहा है. जब तक गरीबी, खराब प्रशासन और मानवाधिकारों के हनन जैसे मूल मुद्दों को हल नहीं किया जाएगा, तब तक हालात नहीं बदलेंगे.
क्या है इस गंभीर संकट का समाधान?
बलूचिस्तान में सुधार और स्थायी शांति तभी संभव है जब पाकिस्तान सरकार अपना नजरिया बदले. सरकार को इसे सिर्फ सुरक्षा या आतंकवाद का मुद्दा मानने के बजाय एक राजनीतिक और मानवीय समस्या के रूप में देखना होगा. दमनकारी नीतियों को छोड़कर प्रांतीय स्वायत्तता देनी होगी. वहां के स्थानीय बलूच युवाओं को रोजगार और सम्मानजनक जीवन देना होगा. खनिजों की कमाई का बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान के विकास पर ही खर्च करना होगा. वास्तविक राजनीतिक संवाद से ही इस दशक पुराने संकट का स्थायी हल निकल सकता है.
