magnetless
motor: भारतीय स्टार्टअप ‘विमैग लैब्स’ ने दुर्लभ खनिजों पर चीन के एकाधिकार को चुनौती देते हुए एक ऐसी पेटेंटेड ‘सॉफ्टवेयर डिफाइंड’ ईवी मोटर बनाई है जो बिना किसी परमानेंट चुंबक के सिर्फ तांबे और स्टील की मदद से बेहतरीन माइलेज देगी.
magnetless ev motor: बेंगलुरु के एक छोटे से स्टार्टअप ने दुनिया के सबसे बड़े बाजार चीन को टक्कर देने की पूरी तैयारी कर ली है. साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन लगा था. उस समय ‘विमैग लैब्स’ नाम के स्टार्टअप के सीईओ मनीष सेठ की इलेक्ट्रिक व्हीकल यानी ईवी मोटर के प्रोटोटाइप के लिए जरूरी चुंबक शंघाई बंदरगाह पर फंस गए थे. करीब तीन महीने तक वह सामान वहीं अटका रहा. फोर्ड और वोक्सवैगन जैसी बड़ी कंपनियों में काम कर चुके मनीष सेठ ने तभी ठान लिया कि वे एक ऐसी मोटर बनाएंगे, जिसमें चीन के चुंबक की जरूरत ही न पड़े. आज उनका यह सपना हकीकत बनकर पूरी दुनिया के सामने आ चुका है.
मोटर मार्केट पर चीन का कब्जा
एक आम इलेक्ट्रिक गाड़ी में बैटरी बिल्कुल फ्यूल टैंक की तरह काम करती है और इंजन की जगह मोटर लगी होती है. यही मोटर तय करती है कि गाड़ी को कितनी ताकत मिलेगी और वह एक बार चार्ज होने पर कितनी दूर तक जाएगी. अब तक दुनिया भर की बेहतरीन परफॉर्मेंस वाली गाड़ियों में परमानेंट मैग्नेट यानी स्थायी चुंबक का ही इस्तेमाल होता आया है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, इस चुंबक को बनाने में काम आने वाले दुर्लभ खनिजों पर अकेले चीन का करीब 90 से 94 फीसदी तक कब्जा है. चीन के इसी एकाधिकार की वजह से भारत समेत पूरी दुनिया को हमेशा उसके सामने झुकना पड़ता था.
सॉफ्टवेयर बदलेगा तांबे को चुंबक में
बिना चुंबक के पुरानी तकनीक वाली जो मोटर बाजार में मौजूद हैं, वे बहुत भारी होती हैं और गाड़ियां ज्यादा बैटरी खाने लगती हैं. इस भारतीय स्टार्टअप ने इसका एक बेहद जादुई तोड़ निकाला है. उन्होंने मोटर के भीतर से सारे महंगे और भारी चुंबक पूरी तरह बाहर निकाल दिए हैं. उनकी जगह साधारण तांबे के तारों और स्टील का एक खास ढांचा तैयार किया गया है. जैसे ही गाड़ी का एक्सीलेटर दबाया जाता है, बैटरी से निकलने वाले करंट को एक स्मार्ट सॉफ्टवेयर कंट्रोल करता है. यह सॉफ्टवेयर वायरलेस तरीके से करंट को मोटर के अंदर भेजता है और वहां मौजूद तांबे के तारों को तुरंत एक बेहद शक्तिशाली ‘करंट वाले चुंबक’ में बदल देता है. इसे कंपनी ‘सॉफ्टवेयर डिफाइंड मैग्नेट’ कह रही है.
रिफाइनिंग के झंझट से मिलेगी मुक्ति
इस नई स्वदेशी मोटर के आने से भारत को एक बहुत बड़ा फायदा होने वाला है. हमारे देश के पास जमीन के नीचे दुर्लभ खनिजों का भंडार तो है, लेकिन उन्हें साफ और रिफाइन करने की तकनीक नहीं है. खनिजों को साफ करने में बहुत खतरनाक कचरा निकलता है, जिससे बचने के लिए दुनिया के ज्यादातर देश चीन से ही यह काम करवाते हैं. भारत को ऐसा रिफाइनिंग इकोसिस्टम बनाने में कम से कम 15 साल का समय लगेगा. लेकिन इस नई तकनीक में सिर्फ तांबे और स्टील का इस्तेमाल होता है, इसलिए इस मोटर को पूरी तरह से भारत के भीतर ही आसानी से बनाया जा सकता है.
बड़े ब्रांड्स के साथ टेस्टिंग शुरू
विमैग लैब्स को इस शानदार तकनीक के लिए अपना पांचवां भारतीय पेटेंट भी मिल चुका है. फिलहाल देश की टॉप पांच बड़ी इलेक्ट्रिक टू व्हीलर कंपनियों के साथ मिलकर इस मोटर की टेस्टिंग की जा रही है. इसके अलावा यूरोप की कार कंपनियों और भारत के एक प्रीमियम हेरिटेज ऑटोमोबाइल ब्रांड के साथ भी बातचीत का दौर चल रहा है. इस स्टार्टअप को एक्सेल कंपनी की तरफ से 5 मिलियन डॉलर का निवेश मिला है, जिसकी मदद से वे इस साल के अंत तक बाजार में अपनी 10 हजार मोटर्स उतारने की तैयारी कर रहे हैं. भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल मिलिट्री और अंतरिक्ष अभियानों में करने के लिए सरकार से भी चर्चा की जाएगी.
