दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़े लोगों की गलतियों की सजा बच्चों को न मिले, इसी को देखते हुए बड़ा फैसला लिया है. उन्होंने यह फैसला कोर्ट में आए एक केस के बाद में लिया है, जिसमें कोर्ट ने कहा कि किसी भी बच्चे को अपने असली पिता के बारे में जानने के अधिकार है. वह इस सच को छिपा नहीं सकता है.
दरअसल, फैमिली कोर्ट में एक महिला ने दावा किया था कि वह एक व्यक्ति के साथ में पति पत्नी की तरह रह रही है. दोनों के तीन बच्चे भी है. जब उसने उस व्यक्ति के बच्चों को पालने की बात की, तो व्यक्ति ने बच्चों और महिला से रिश्ता तोड़ दिया. महिला ने कोर्ट में स्कूल रिकार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड और परिवार की तस्वीरें बयान के रूप में पेश की, जिसमें उस व्यक्ति को पिता बताया गया है. महिला के सबूतों को देखने के बाद में फैमिली कोर्ट ने DNA कराने का आदेश दिया.
फैमिली कोर्ट के फैसले के बाद में उस व्यक्ति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उसने कहा कि यह टेस्ट उसके परिवार को बदनाम करने के लिए करवाया जा रहा है. इस टेस्ट से उसके और उसके परिवार के सम्मान पर असर पड़ेगा. इसी कारण से टेस्ट पर रोक लगाई जाए.
हालांकि, हाईकोर्ट ने व्यक्ति की इस दलील को पूरी तरीके से ठुकरा दिया. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि दो बड़े अपने फैसले से एक साथ आते हैं और बच्चों को पैदा करते हैं. उनमें से कोई भी बाद में अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता है. उनके फैसलों का बोझ बच्चों पर नहीं डाला जा सकता है. उन्होंने कहा कि कानून किसी को भी छूट नहीं देता है कि वह अपने अधिकारों की बातें करके अपनी जिम्मेंदारियों से भागे. बच्चों का फैसला भावनात्मक नहीं बल्कि उनके भरण पोषण और भविष्य से भी जुड़ा होता है. इसी कारण से किसी की शर्मिंदगी बच्चों को उनकी पहचान से वंचित नहीं रख सकती है. सच्चाई के सामने आने के लिए टेस्ट जरूर होगा. बच्चों ने अपनी परिस्थितियां नहीं चुनी है. बच्चों को सच जानने का अधिकार है.
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