Muzaffarnagar bonded laborers rescued: यह खबर उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की एक फैक्ट्री में दो साल से बंधुआ बनाकर रखे गए 12 मजदूरों को मुक्त कराए जाने, उन्हें दी जाने वाली अमानवीय यातनाओं और एक नेपाली मजदूर की संदिग्ध मौत की पूरी कहानी बयां करता है.

Muzaffarnagar bonded laborers rescued: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले से एक ऐसी दर्दनाक कहानी सामने आई है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है. यहां की एक डिस्पोजेबल प्लेट बनाने वाली फैक्ट्री में 12 मजदूरों को करीब दो साल से बंधुआ बनाकर रखा गया था. इन बेबस मजदूरों को जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने पर मजबूर किया जा रहा था. इस नरक से बचकर भागे एक मजदूर ने जब किसी तरह पुलिस तक पहुंचकर आपबीती सुनाई, तब जाकर इस बड़े जुल्म का खुलासा हुआ. इसके बाद पुलिस और प्रशासन की टीम ने मंगलवार को फैक्ट्री पर छापा मारकर इन सभी मजदूरों को आजाद कराया, जिनमें कुछ नाबालिग भी शामिल हैं.
इन सीधे-साधे मजदूरों को अलग-अलग राज्यों के बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों से बहला-फुसलाकर यहां लाया गया था. इन्हें लालच दिया गया था कि हर महीने 12 से 15 हजार रुपये सैलरी मिलेगी और सिर्फ 8 घंटे काम करना होगा. लेकिन फैक्ट्री के अंदर कदम रखते ही इनकी दुनिया पूरी तरह बदल गई. फैक्ट्री मालिकों ने सबसे पहले इनके मोबाइल फोन और पहचान पत्र छीन लिए ताकि ये किसी से संपर्क न कर सकें. इसके बाद फैक्ट्री के भारी लोहे के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए गए. इन मजदूरों को महीनों तक सैलरी का एक रुपया भी नहीं दिया गया और इनसे दिन-रात जबरन काम कराया जाने लगा.
कैद किए गए मजदूरों को दिन में 18 से 20 घंटे तक लगातार काम करना पड़ता था. सुबह चार बजे से शुरू हुआ काम आधी रात तक चलता था और इन्हें सिर्फ दो-तीन घंटे ही सोने दिया जाता था. आगरा के रहने वाले सोनू और नैनीताल के रामू ने रोते हुए बताया कि उन्हें खाने में सिर्फ पशुओं के चारे वाले भूसे से बनी रूखी रोटियां दी जाती थीं. चौबीस घंटे में सिर्फ एक बार मिलने वाली इन रोटियों को उन्हें नमक और लाल मिर्च के सहारे चबाना पड़ता था. अगर काम करते समय किसी को नींद आ जाती या कोई बीमार पड़ जाता, तो सुपरवाइजर उन्हें बेल्ट, डंडों और नुकीली चीजों से बेरहमी से पीटते थे.
फैक्ट्री को किसी हाई-टेक जेल की तरह बनाया गया था ताकि वहां से भागना नामुमकिन हो. चारों तरफ बहुत ऊंची दीवारें थीं और पूरे परिसर में जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. अगर कोई मजदूर भागने की कोशिश भी करता, तो उस पर फैक्ट्री के अंदर पाले गए खूंखार पिटबुल कुत्ते छोड़ दिए जाते थे. मजदूरों ने बताया कि उन पिटबुल कुत्तों को दूध और मांस जैसा अच्छा खाना दिया जाता था, जबकि इंसानों को सूखी रोटी के लिए भी तरसाया जाता था. कई मजदूरों के शरीर पर इन खूंखार कुत्तों के काटने और बेल्ट की पिटाई के गहरे जख्म मिले हैं.
इस पूरे मामले में सबसे खौफनाक खुलासा एक मजदूर की मौत को लेकर हुआ है. आजाद हुए मजदूरों ने पुलिस को बताया कि पिछले साल नवंबर में नेपाल के रहने वाले अर्जुन उर्फ टोपी नाम के एक मजदूर की मालिकों की पिटाई और यातनाओं के कारण मौत हो गई थी. आरोपी उसकी लाश को एक बैग में भरकर कहीं दूर ठिकाने लगा आए थे. इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद पुलिस ने हत्या और शव छिपाने का एक नया केस दर्ज कर लिया है. लंबे समय बाद पेट भरकर रोटी खाने वाले इन मजदूरों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं और पुलिस इस रैकेट के सभी गुनहगारों को दबोचने में जुट गई है.
