Donald Trump Xi Jinping Meeting: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे और डोनाल्ड ट्रंप द्वारा उनके शाही स्वागत पर भारतीय विशेषज्ञों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी के अनुसार ट्रंप का यह रवैया साबित करता है कि वे विरोधियों का तुष्टिकरण करते हैं और मित्र राष्ट्रों पर धौंस जमाते हैं. जानिए ट्रंप की इस दोहरी कूटनीति का भारत पर क्या असर होगा.

Donald Trump Xi Jinping Meeting: करीब एक दशक बाद अमेरिका पहुंचे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का जिस गर्मजोशी और शाही अंदाज में स्वागत हुआ है, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बदले पैंतरे ने कूटनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है. अमेरिका और चीन को एक-दूसरे का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जाता है. हाल ही में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव पास किया था जिसमें चीन भी शामिल था. लेकिन इस शाही स्वागत के बाद भारतीय जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने आलोचकों के आरोपों को सच साबित कर दिया है.
तानाशाहों का तुष्टिकरण और दोस्तों पर दबाव
भारतीय विदेश नीति के प्रमुख विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इस मुलाकात पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति को ‘धौंस दिखाने वाले दबंग’ का व्यवहार करार दिया है. चेलानी के अनुसार ट्रंप का यह रवैया साबित करता है कि वे अमेरिका के कट्टर विरोधियों और तानाशाहों के सामने नरम पड़ जाते हैं. दूसरी तरफ वे अमेरिका के सच्चे दोस्त देशों पर लगातार दबाव बनाते हैं और उन पर धौंस जमाने की कोशिश करते हैं. इस तरह का रवैया किसी भी मजबूत और निष्पक्ष वैश्विक नेता की छवि से बिल्कुल मेल नहीं खाता है.
पाकिस्तान और यूक्रेन के उदाहरण से समझें ट्रंप की नीति
डोनाल्ड ट्रंप के इस रवैये के कई उदाहरण पहले भी देखने को मिले हैं. पहलगाम में हुए बड़े आतंकी हमले के तुरंत बाद ट्रंप ने पाकिस्तानी फौजी जनरल असीम मुनीर का व्हाइट हाउस में खास स्वागत किया था. इसके विपरीत अमेरिकी निर्देशों का पालन करने के बावजूद यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की को कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से असहज किया गया. भारत के मामले में भी वे रूस से तेल आयात पर बार-बार टैरिफ की धमकियां देते रहे हैं. हालाँकि भारत ने अमेरिकी धमकियों के आगे झुकने से हमेशा साफ इनकार किया है.
ताकत के आगे झुकने की कूटनीतिक मानसिकता
विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप केवल उसी देश की बात सुनते हैं जो उन्हें उनकी ही भाषा में जवाब देता है. वे कमजोर या नरम रुख अपनाने वाले नेताओं पर अपना दबदबा बनाने की कोशिश करते हैं और उनसे अनुचित रियायतें मांगते हैं. लेकिन चीन जैसे शक्तिशाली देश जो अमेरिका के हर कदम का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम हैं, उनके सामने ट्रंप का रुख बिल्कुल बदल जाता है. शी जिनपिंग का यह अमेरिकी दौरा इसी कूटनीतिक सोच की ओर साफ इशारा करता है.
वेनेजुएला की घटना और ट्रंप का इतिहास
डोनाल्ड ट्रंप का पिछला इतिहास भी इस बात की गवाही देता है कि वे अंतरराष्ट्रीय नियमों की परवाह नहीं करते. वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को देर रात उनके ही घर से उठवाने वाली घटना इसका बड़ा प्रमाण है. इस तरह के कदम आधुनिक कूटनीतिक इतिहास में काफी विवादित माने जाते हैं. जब किसी शक्तिशाली विरोधी से सामना होता है तो ट्रंप का यह सख्त रुख अचानक गायब हो जाता है. यही वजह है कि विशेषज्ञ उनके इस दोहरे रवैये पर सवाल उठा रहे हैं.
भारत का ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ दांव और भविष्य की राह
अमेरिका और चीन की इस नजदीकी के बीच भारत बेहद सतर्कता के साथ अपनी विदेश नीति पर आगे बढ़ रहा है. भारत किसी भी एक महाशक्ति के दबाव में आए बिना अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रख रहा है. रूस से तेल खरीद का मामला हो या व्यापारिक प्रतिबंधों की चुनौती, भारत ने अपनी स्वायत्तता बनाए रखी है. दोनों महाशक्तियों के बीच बन रहे नए समीकरणों के दौर में भारत का यह स्वतंत्र रुख ही उसे वैश्विक मंच पर एक मजबूत स्थिति में खड़ा रखता है.
