डिंपल यादव वो नाम जो कभी राजनीति में आना नहीं चाहती थी, लेकिन जब आई तो यूपी की राजनीति समिकरण को ही बदल कर रख दिया, साल 2024 के लोकसभा चुनाव का प्रचार चल रहा था, लोकसभा चुनाव का प्रचार चल रहा था, समाजवादी पार्टी के बड़े-बड़े नेता मैदान में थे, लेकिन जहां भी डिंपल यादव की रैली होती, वहां भीड़ अलग दिखाई देती, महिलाएं बड़ी संख्या में पहुंचतीं, युवा सेल्फी लेने के लिए उमड़ पड़ते और पार्टी कार्यकर्ता कहते दिखाई देते…मैडम आ रही हैं… अब सवाल यह है कि क्या डिंपल यादव सिर्फ अखिलेश यादव की पत्नी हैं? या फिर सपा के भीतर उनकी भूमिका उससे कहीं बड़ी हो चुकी है?

जो राजनीति में आना ही नहीं चाहती थीं
डिंपल यादव का शुरुआती स्वभाव राजनीति से बिल्कुल अलग माना जाता था, शांत, कम बोलने वाली और मीडिया से दूरी बनाने वाली, शादी के बाद भी लंबे समय तक उन्होंने खुद को सक्रिय राजनीति से दूर रखा, जब अखिलेश सांसद बने, मंत्री बने और फिर मुख्यमंत्री बने, तब भी डिंपल पर्दे के पीछे ही रहीं, लेकिन राजनीति में एक कहावत है… सत्ता के जितना करीब कोई रहता है, राजनीति उससे उतनी दूर नहीं रहती।
पहली हार ने बदल दी सोच
साल 2009 में डिंपल यादव ने फिरोजाबाद उपचुनाव लड़ा, सपा को भरोसा था कि सीट आसानी से निकल जाएगी, लेकिन नतीजा उल्टा आया, डिंपल चुनाव हार गईं, यहीं से कहानी दिलचस्प होती है, कई नेताओं के लिए पहली हार राजनीति का अंत होती है, लेकिन डिंपल के लिए यही हार राजनीति की असली शुरुआत बन गई। इसके बाद उन्होंने संगठन को समझना शुरू किया, जमीन पर उतरकर जनता से जुड़ना शुरू किया और धीरे-धीरे एक नेता के रूप में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
परिवार की बहू से पार्टी का चेहरा बनने तक
मुलायम सिंह यादव के दौर में सपा की पहचान कुछ खास पुरुष नेताओं तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन समय के साथ अखिलेश ने पार्टी की नई छवि बनाने की कोशिश की, इस नई छवि में डिंपल यादव की भूमिका बेहद अहम रही, उनकी सादगी… उनकी शांत भाषा और विवादों से दूरी… इन सबने सपा को एक सॉफ्ट महिला चेहरा देने का काम किया, अब जहां अखिलेश सरकार पर हमला करते हैं… वहीं डिंपल भावनात्मक और सामाजिक मुद्दों पर बात करती नजर आती हैं।
2017 की पारिवारिक लड़ाई और डिंपल
जब समाजवादी परिवार दो खेमों में बंट गया था… मुलायम सिंह यादव एक तरफ… अखिलेश यादव दूसरी तरफ… तब डिंपल यादव ने सार्वजनिक तौर पर ज्यादा बयान नहीं दिए, लेकिन पार्टी के अंदरूनी नेताओं की मानें तो उस दौर में परिवार और राजनीति के बीच संवाद बनाए रखने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, यानी कैमरे पर कम… लेकिन पर्दे के पीछे से डिंपल ने अपना काम बखुबी किया और इसी का नतिजा रहा की अखिलेख को सपा का सर्वेसर्वा बना दिया गया। चाचा और भतिजे के बीच कुछ दिन जरूर अनबन रही लेकिन बाद में सब सही हो गया, परिवार को एकजुट करने में सबसे ज्यादा किसी का हाथ था तो वो डिंपल यादव का ही था।
डिंपल ही हैं अखिलेश की सबसे बड़ी सलाहकार
सपा के कई नेताओं का मानना है कि, पिछले कुछ सालों में डिंपल यादव का सपा पर प्रभाव काफी बढ़ा है, टिकट वितरण हो… महिला वोट बैंक की रणनीति हो… या पार्टी की सार्वजनिक छवि… कई मुद्दों पर डिंपल की राय के महत्वपूर्ण मानी जाती है, हालांकि पार्टी कभी औपचारिक रूप से ऐसा स्वीकार नहीं करती।
लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा जरूर होती है कि, डिंपल आज सिर्फ सांसद नहीं हैं, वे अखिलेश यादव की पत्नी के साथ, सबसे भरोसेमंद राजनीतिक सर्कल का हिस्सा भी हैं।
क्यों बढ़ रही है डिंपल की अहमियत?
सपा में डिंपल यादव की अहमियत बढ़ने के पीछे तीन बड़े कारण हैं….
महिला वोट बैंक
सपा महिलाओं के बीच उतनी मजबूत नहीं मानी जाती, जितनी बीजेपी और दूसरी पार्टियों मानी जाती है, सपा में डिंपल ही वो महिला नेता हैं, जो इस कमी को पूरा कर सकती हैं, क्योंकि डिंपल ही हैं, जिनका जमीन पर महिलाओं के बीच अच्छी पकड़ हैं और जो वोट में कनवर्ट होता है और इसका फायदा आने वाले 2027 के यूपी विधानसभा में देखने को मिल सकता है।
सॉफ्ट इमेज
जहां बाकी नेता तीखी बयानबाजी करते हैं, वहीं डिंपल की छवि संयमित नेता की है, और वो कोई भी बात बहुत सोच-समझकर बोलती हैं।
परिवार और संगठन के बीच पुल
यादव परिवार और पार्टी संगठन के बीच संवाद का एक भरोसेमंद चेहरा भी डिंपल यादव को ही माना जाता है। कई बार पार्टी को लेकर परिवार में बहस भी हुई है, जिसको डिंपल ने बहुत की समझदारी के साथ सुलझाया है।
डिंपल भविष्य में और बड़ी भूमिका निभाएंगी?
आज डिंपल सांसद हैं, पार्टी की स्टार प्रचारक हैं, अखिलेश की सबसे भरोसेमंद साथी हैं। लेकिन सवाल यह है… क्या आने वाले समय में वे सिर्फ प्रचार तक सीमित रहेंगी? या फिर समाजवादी पार्टी की रणनीति और संगठन में उनकी भूमिका और बढ़ेगी? क्या सपा के भीतर एक नया पावर सेंटर उभर रहा है? या फिर डिंपल की ताकत सिर्फ उनकी लोकप्रियता तक सीमित है? राजनीति में ताकत हमेशा पद से नहीं मापी जाती, कई बार असली ताकत वो होती है जो मंच के पीछे बैठकर फैसलों को प्रभावित करती है, डिंपल यादव पर्दे के पीछे रहकर, सपा में अपना असर तो डाल ही रही हैं और अब 2027 के विधानसभा चुनाव में फ्रंट में आकर चुनाव में अपना असर दिखा सकती हैं और अगर ऐसा होता है तो अखिलेश को पीडीए के साथ यूपी में महिलाओं का भी साथ मिल जाएगा, और यूपा में सत्ता की राह और भी आसान हो सकतील है। और ऐसा अगर होता है तो आने वाले समय में डिंपल समाजवादी पार्टी में एक मजबूत आधार बन सकती हैं। जिसकी चर्चा अभी धीरे-धीरे हो भी रही है।
