इलाहाबाद हाईकोर्ट में आज पुलिस हिरासत से संबंधित अहम फैसला लिया गया है. दरअसल, कोर्ट ने कहा हैं कि अगर कोई भी व्यक्ति 24 घंटे से ज्यादा थाने में रखा जाएगा, तो उसे संबंधित विभाग द्वारा 25000 रुपये का मुआवजा दिया जाएगा. वहीं, अगर जांच में पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट दोषी करार हुआ, तो वह राशि उसके वेतन में से काटी जाएगी.
क्यों लिया गया यह फैसला
दरअसल, पूरा मामला गाजियाबाद के टीला थाना क्षेत्र से शुरू हुआ है. 22 फरवरी 2026 को सुबह 11 बजे चौंकी प्रभारी राजेंद्र सिंह ने दिव्यांग अधिवक्ता चंदर पाल सिंह को जबरदस्ती हिरासत में लिया था. नियमानुसार, अगर कोई भी व्यक्ति हिरासत में लिया जाता है, तो उसे 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है. हालांकि, चंदर पाल के केस में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. यहां तक की उससे 50,000 रुपये का बॉन्ड लेकर भी जेल में रखा गया.
चंदर पाल की पत्नी ने इसी कारण से कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. वह खुद भी दिव्यांग है. 25 फरवरी 2026 को कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते समय हस्तक्षेप कर उसे रिहा कर दिया.
जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी और जस्टिस सिद्धार्थ ने इस सुनवाई के दौरान में दिव्यांग कपल के साथ हुए व्यवहार के बाद में महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया. कोर्ट ने कहा कि हिरासत के मामले में सिर्फ 20,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड लेने का रुल है. उससे अधिक का राशि लेने के बाद में आपको लिखित कारण बताना होगा. अगर व्यक्ति ने बॉन्ड भर दिया है, तो उसे उसी दिन रिहा कर देना होगा.
अगर कोई व्यक्ति 24 घंटे से ज्यादा अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है, तो उसे 25000 रुपये रोजाना के हिसाब से मुआवजा देना होगा. कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि राज्य सरकार को 6 हफ्ते के अंदर-अंदर चंदर पाल को तीन दिन के अवैध हिरासत में रखने के लिए 75,000 रुपये की राशि मुआवजे के रूप में देनी होगी.
कोर्ट ने यूपी के डीजीपी को आदेश जारी करते हुए कहा कि फैसले की जानकारी उत्तर प्रदेश के सभी पुलिस अधिकारियों की दी जाए. पुलिस कमिश्नर को आदेश का पालन हुआ या नहीं, इसकी रिपोर्ट 14 सितंबर 2026 तक जमा करवानी होगी. अगर आदेश का पालन नहीं किया जाएगा, तो सभी अधिकारियों को खुद कोर्ट में मौजूद होना पड़ेगा.
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