ayodhya ram mandir trust: ये खबर किशोर कुणाल की पुस्तक ‘अयोध्या रीविजिटेड’ के संदर्भ में राम मंदिर के पुजारियों की सैलरी, ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के 15 सदस्यों की जिम्मेदारियों और किसी मान्यता प्राप्त चैरिटेबल ट्रस्ट के काम करने के कानूनी नियमों की पूरी जानकारी देता है.

ayodhya ram mandir trust: अयोध्या का भव्य राम मंदिर इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. मंदिर में चढ़ावे और चंदे को लेकर कुछ गड़बड़ियों की बातें सामने आई हैं, जिसके बाद सरकार पूरी तरह गंभीर है और मामले की जांच चल रही है. वैसे आपको बता दें कि राम मंदिर की देखरेख का सारा जिम्मा ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के कंधों पर है. इस मंदिर में होने वाले हर एक कार्यक्रम का आयोजन और देश विदेश से आने वाले चंदे का पूरा हिसाब किताब यही ट्रस्ट रखता है. इस पूरे विषय, राम जन्मभूमि आंदोलन और मंदिर प्रबंधन की कानूनी व्यवस्था को गहराई से समझने के लिए आप लेखक किशोर कुणाल की प्रसिद्ध किताब ‘अयोध्या रीविजिटेड’ के ऐतिहासिक और प्रशासनिक दस्तावेजों का संदर्भ ले सकते हैं. यह किताब मंदिर की प्राचीन व्यवस्था से लेकर आधुनिक प्रबंधन तक के ढाँचे पर बहुत ही प्रामाणिक जानकारी देती है.
इस ट्रस्ट के पास मंदिर के खर्चों के साथ साथ वहां काम करने वाले पुजारियों और कर्मचारियों की सैलरी का भी पूरा लेखा जोखा होता है. मंदिर के मुख्य पुजारी को हर महीने करीब 38,500 रुपये का वेतन दिया जाता है. वहीं, उनके साथ काम करने वाले सहायक पुजारियों को उनके पद और अनुभव के हिसाब से 33 हजार से 36 हजार रुपये प्रति माह मिलते हैं. इसके अलावा मंदिर के कोठारी, भंडारी और स्टोर रूम का मैनेजमेंट देखने वाले स्टाफ को 19 हजार से 24 हजार रुपये तक की सैलरी दी जाती है. दानपात्रों से निकलने वाले चढ़ावे की गिनती करने के लिए कुछ प्राइवेट और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को रखा गया है, जिन्हें लगभग 20 हजार रुपये महीना मिलता है. इन सभी पुजारियों को वेतन के साथ रहने के लिए घर, मुफ्त भोजन, मेडिकल सुविधाएं और हफ्ते में एक दिन की छुट्टी भी दी जाती है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार ने जिस ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ का गठन किया है, उसमें कुल 15 मुख्य सदस्य शामिल हैं. यह पूरा बोर्ड किसी बड़ी कॉर्पोरेट गवर्निंग बॉडी की तरह काम करता है, जिसमें अलग अलग लोगों को खास जिम्मेदारियां दी गई हैं. इन 15 सदस्यों में से केवल 11 लोगों के पास ही किसी फैसले पर वोट देने का कानूनी अधिकार होता है. सरकारी अधिकारियों और निर्मोही अखाड़े के प्रतिनिधियों को इस बोर्ड में शामिल तो किया गया है, लेकिन उन्हें वोटिंग का अधिकार नहीं मिला है. इस बोर्ड में देश के बड़े संत धार्मिक तौर तरीके तय करते हैं, वरिष्ठ नौकरशाह कानून व्यवस्था की कमान संभालते हैं और अनुभवी कोषाध्यक्ष मंदिर की तिजोरी और पैसों की निगरानी का काम देखते हैं.
अगर ट्रस्ट के मुख्य पदाधिकारियों की बात करें, तो इसके सर्वोच्च अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास हैं, जो सभी नीतिगत और धार्मिक फैसले लेते हैं. ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय एक तरह से मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में काम करते हैं, जिनके जिम्मे जमीन अधिग्रहण, अदालती मामले और मीडिया ब्रीफिंग का काम है. स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज इसके कोषाध्यक्ष हैं, जो करोड़ों रुपये के दान और बैंक खातों का ऑडिट संभालते हैं. वहीं, प्रधानमंत्री कार्यालय के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा इसके निर्माण समिति के चेयरमैन हैं, जो मंदिर की इंजीनियरिंग और नक्काशी की कमान देख रहे हैं. भारत के कानून के तहत कोई भी चैरिटेबल ट्रस्ट ‘भारतीय ट्रस्ट अधिनियम 1882’ के तहत रजिस्टर्ड होकर काम करता है, जिसका मकसद मुनाफा कमाना नहीं बल्कि समाज और धर्म का कल्याण करना होता है.
किसी भी मान्यता प्राप्त ट्रस्ट को सुचारू रूप से चलाने के लिए आयकर विभाग की तरफ से टैक्स में विशेष छूट मिलती है. ट्रस्ट को हर साल किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से अपने पूरे खातों का बारीकी से ऑडिट कराना अनिवार्य होता है, जिसकी रिपोर्ट सीधे चैरिटी कमिश्नर और इनकम टैक्स विभाग को भेजी जाती है. ट्रस्ट को मिलने वाले पैसे का सबसे बड़ा हिस्सा मंदिर की पूजा पाठ और उसके मूल उद्देश्यों पर खर्च होता है, जबकि दूसरा हिस्सा कर्मचारियों की सैलरी और बिजली बिल जैसे प्रशासनिक कामों में जाता है. सरकार इन सभी ट्रस्टों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखती है. अगर कोई भी ट्रस्ट अपने तय नियमों से हटकर काम करता है या पैसों में किसी तरह की हेराफेरी करता है, तो सरकार के पास उसका रजिस्ट्रेशन रद्द करने और ट्रस्टीज पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होता है.
