bangladesh political crisis 2026: बांग्लादेश में BMP के सांसदों ने जुलाई चार्टर पर दूसरी शपथ से इनकार किया, जिससे Jamaat-e-Islami और एनसीपी ने शपथ समारोह का बहिष्कार कर दिया. शपथ लेने वाले नेता तारीक के खिलाफ सड़क आंदोलन की चेतावनी दी गई, जबकि अंतरिम प्रमुख यूनूस के कराए चुनाव और जनमत संग्रह पर विवाद गहरा गया.

bangladesh political crisis 2026: मंगलवार को बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला. एक तरफ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने सरकार का कामकाज संभाल लिया. दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी और उसकी सहयोगी नेशनल सिटिजन पार्टी पहले ही दिन आक्रामक रुख में आ गईं. बीएनपी के नवनिर्वाचित सांसदों ने संसद सदस्य के रूप में शपथ ली. लेकिन उन्होंने जुलाई चार्टर से जुड़ी संविधान सुधार परिषद के सदस्य के तौर पर शपथ लेने से साफ इनकार कर दिया. इसी फैसले से नाराज होकर जमात और एनसीपी ने बीएनपी के कैबिनेट शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार कर दिया. जमात नेताओं का कहना है कि दोहरी शपथ की व्यवस्था पहले से तय थी और उससे पीछे हटना जनता के फैसले का अपमान है.
जमात नेता शफीकुल इस्लाम मसूद ने बताया कि पार्टी की संसदीय समिति की बैठक में यह फैसला लिया गया. उन्होंने कहा कि जब बीएनपी संविधान सुधार परिषद के लिए शपथ लेने को तैयार नहीं है, तो जमात भी सरकार के शपथ समारोह में शामिल नहीं होगी. जमात और एनसीपी की मांग थी कि संसद की शपथ के साथ-साथ जुलाई चार्टर से जुड़ी शपथ भी होनी चाहिए. दोनों दल मानते हैं कि जनमत संग्रह में लोगों ने जिस बदलाव का समर्थन किया है, उसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए. इसी मुद्दे पर दोनों पार्टियां खुलकर बीएनपी के खिलाफ खड़ी हो गई हैं.
12 फरवरी को हुए आम चुनाव में तारिक रहमान की पार्टी बीएनपी ने 212 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की. वहीं जमात और एनसीपी समेत 11 सहयोगी दलों ने मिलकर 77 सीटों पर जीत दर्ज की. इसी दिन जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह भी कराया गया था. इसमें 62 प्रतिशत लोगों ने समर्थन दिया था. जुलाई चार्टर का उद्देश्य संसद को 180 दिनों के लिए संविधान सभा में बदलना है. इसके जरिए संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव किए जाने हैं. बीएनपी ने पहले इस चार्टर पर हस्ताक्षर तो किए थे. लेकिन अब पार्टी का कहना है कि अंतिम दस्तावेज में कई नई बातें जोड़ दी गई हैं. साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि चार्टर तैयार करते समय बीएनपी की राय ठीक से नहीं ली गई.
इस पूरे विवाद के बीच अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस की भूमिका भी सामने आई है. चुनाव से पहले जमात और एनसीपी सुधार पहले लागू करने की मांग कर रहे थे. वहीं बीएनपी पहले चुनाव कराने के पक्ष में थी. आखिरकार 12 फरवरी को चुनाव और जनमत संग्रह दोनों एक साथ करा दिए गए. बीएनपी ने मंगलवार को घोषणा की कि उसके सांसद संविधान सुधार परिषद के सदस्य के रूप में शपथ नहीं लेंगे. इसके उलट जमात और एनसीपी गठबंधन के सांसदों ने संसद सदस्य और संविधान सुधार आयोग दोनों के लिए शपथ ली. यही दोहरी शपथ का मुद्दा अब सबसे बड़ा राजनीतिक टकराव बन गया है.
इसी बीच जमात और एनसीपी ने बीएनपी के खिलाफ सड़क पर उतरने की चेतावनी भी दे दी है. जमात नेताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव में हेरफेर हुई है और चुनाव के बाद हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं. नोआखाली में एनसीपी समर्थक महिला से कथित सामूहिक दुष्कर्म को लेकर भी विरोध प्रदर्शन की बात कही गई है. जमात महासचिव मिया गोलाम परवार ने कहा कि खराब चुनाव और बाद की घटनाएं फिर से फासीवाद की याद दिलाती हैं. एनसीपी के आयोजक नासिरुद्दीन पटवारी ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के विरोध में आंदोलन जारी रहेगा. उन्होंने कहा कि वे तारिक रहमान को जवाबदेह ठहराएंगे और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते.
