नई दिल्ली: पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के अचानक पद छोड़ने के फैसले के पीछे की अंदरूनी वजहें अब खुलकर सामने आ रही हैं. सूत्रों के अनुसार, नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर देश भर में जारी छात्र आंदोलन के दौरान उन्होंने एक नहीं, बल्कि दो बार अपने पद से इस्तीफे की पेशकश की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने हर बार उनके आग्रह को ठुकरा दिया था.
शुरुआत में क्यों नहीं स्वीकार हुआ इस्तीफा?
सरकार का शुरुआती रुख यह था कि संकट के समय किसी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा समस्याओं का हल नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा होगा. 20 जुलाई को आयोजित वरिष्ठ मंत्रियों की एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में भी धर्मेंद्र प्रधान ने पद छोड़ने की इच्छा जाहिर की थी. हालांकि, उस समय सरकार ने उन्हें शिक्षा व्यवस्था में सुधार और सुधार प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी पर ध्यान केंद्रित करने को कहा था.
अचानक कैसे बदला सरकार का रुख?
सूत्रों का कहना है कि स्थिति तब अचानक बदल गई जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और सरकार के बीच दूसरे दौर की बातचीत बेनतीजा रही. CJP ने 20 जुलाई के ‘चलो संसद’ मार्च की तर्ज पर दोबारा एक बड़े देशव्यापी आंदोलन का अल्टीमेटम दे दिया.इसी दौरान सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों ने सरकार को एक संवेदनशील रिपोर्ट सौंपी.
सोशल मीडिया पर सीमा पार से साजिश
डिजिटल निगरानी के दौरान 400 से अधिक संदिग्ध सोशल मीडिया खातों की पहचान हुई, जिनमें से लगभग 100 इंस्टाग्राम खाते पाकिस्तान से संचालित होने की बात सामने आई. जांच में पाया गया कि ये वही अकाउंट थे जो पहले ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत विरोधी दुष्प्रचार फैला रहे थे.
उपद्रवियों की मौजूदगी
दिल्ली पुलिस के ‘फेशियल रिकग्निशन सिस्टम’ (FRS) की मदद से 20 से 24 जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर 400 ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिनका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड दर्ज था.
सुरक्षा चिंताओं के बीच लिया गया अंतिम फैसला
देश की कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका और छात्र आंदोलन में असामाजिक तत्वों की घुसपैठ की पुष्टि के बाद सरकार ने अपनी रणनीति बदली। तनाव को और अधिक बढ़ने से रोकने के लिए आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दे दी. इसके तुरंत बाद केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है.
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