उत्तराखंड की धामी सरकार चारधाम और मानसखंड परियोजनाओं के जरिए धार्मिक पर्यटन को रोजगार, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था से जोड़ रही है।

अगर कोई आपसे पूछे कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी ताकत क्या है, तो शायद आपका जवाब होगा… पहाड़, नदियां और भगवान। लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने इन तीनों को उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की है। पहले धार्मिक पर्यटन सिर्फ दर्शन तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब सरकार इसे रोजगार, व्यापार और विकास का माध्यम बनाने की बात कर रही है। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में चारधाम से लेकर मानसखंड तक कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू हुए हैं। सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं से सिर्फ मंदिरों का विकास नहीं हो रहा, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों की आजीविका भी मजबूत हो रही है। आइए समझते हैं कि आखिर उत्तराखंड का यह धार्मिक पर्यटन मॉडल क्या है और इससे लोगों को कितना फायदा हो रहा है।
चारधाम मास्टर प्लान
उत्तराखंड की पहचान चारधाम यात्रा से है। हर साल लाखों श्रद्धालु केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन लंबे समय तक यात्रियों को खराब सड़कें, ट्रैफिक, पार्किंग की कमी और सीमित सुविधाओं का सामना करना पड़ता था। इसी को देखते हुए चारधाम मास्टर प्लान पर तेजी से काम किया गया। ऑल वेदर रोड परियोजना के जरिए यात्रा मार्गों को बेहतर बनाया गया। चारधाम यात्रा को सुगम बनाने वाले इस हाईवे प्रोजेक्ट का कुल बजट लगभग ₹12,000 करोड़ से ऊपर है, केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाएं विकसित की गईं। पार्किंग, पैदल मार्ग, पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य सेवाएं और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया ताकि यात्रा पहले से ज्यादा आसान और सुरक्षित हो सके।
केदारनाथ और बद्रीनाथ का पुनर्विकास
साल 2013 की आपदा के बाद केदारनाथ को फिर से बसाना किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन पिछले कुछ सालों में वहां बड़े स्तर पर पुनर्विकास हुआ है। तीर्थ पुरोहितों के लिए आवास बनाए गए। घाटों और पैदल मार्गों का विकास किया गया। सुरक्षा दीवारें बनाई गईं और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विस्तार किया गया। इसी तरह बद्रीनाथ धाम में भी मास्टर प्लान के तहत कई विकास कार्य किए जा रहे हैं। बद्रीनाथ को मिनी स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने के लिए करीब ₹481 करोड़ का मास्टर प्लान तैयार किया गया है और इस पर तेजी से काम भी हो रहा है । धामी सरकार का उद्देश्य सिर्फ मंदिरों को सुंदर बनाना नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के पूरे यात्रा अनुभव को बेहतर बनाना है।
मानसखंड मंदिर माला मिशन
अगर गढ़वाल की पहचान चारधाम है तो कुमाऊं की पहचान उसके प्राचीन मंदिर हैं। इसी सोच के साथ धामी सरकार ने मानसखंड मंदिर माला मिशन पर काम शुरू किया। इस परियोजना में कुल 113.24 करोड़ का बजट पास है, जागेश्वर धाम, कैंची धाम, पूर्णागिरि, चितई गोलू देवता मंदिर समेत कई प्रमुख धार्मिक स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा रहा है। सड़क, पार्किंग, प्रकाश व्यवस्था, पेयजल, शौचालय और अन्य सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव मिल सके और कुमाऊं में भी धार्मिक पर्यटन को नई पहचान मिले।
आस्था से रोजगार तक
सरकार का कहना है कि, धार्मिक पर्यटन का सबसे बड़ा फायदा स्थानीय लोगों को मिल रहा है। जहां पहले केवल यात्रा का मौसम सीमित था, वहीं अब होमस्टे, होटल, टैक्सी सेवा, स्थानीय दुकानें, रेस्टोरेंट, प्रसाद, हस्तशिल्प और गाइड सेवाओं के जरिए रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं। महिलाओं के स्वयं सहायता समूह भी स्थानीय उत्पाद बेचकर अपनी आय बढ़ा रहे हैं। सरकार का दावा है कि पर्यटन बढ़ने से छोटे कारोबारियों और युवाओं को भी फायदा मिल रहा है और पलायन रोकने में मदद मिल रही है।
विकास का नया मॉडल
धामी सरकार का कहना है कि विकास किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसलिए गढ़वाल में चारधाम और कुमाऊं में मानसखंड—दोनों पर समान रूप से काम किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि धार्मिक पर्यटन को इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़कर उत्तराखंड के विकास का नया मॉडल तैयार किया जा रहा है। हालांकि किसी भी मॉडल की सफलता का अंतिम आकलन समय के साथ ही होगा, लेकिन इतना जरूर है कि पिछले कुछ सालों में धार्मिक पर्यटन उत्तराखंड के विकास की सबसे बड़ी चर्चाओं में शामिल हो चुका है। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो आने वाले सालों में उत्तराखंड सिर्फ देवभूमि ही नहीं, बल्कि धार्मिक पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था का भी एक मजबूत उदाहरण बन सकता है।
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