Sharad Pawar Meets PM Modi: छात्र प्रदर्शनकारियों को समर्थन देने के तुरंत बाद संसद सत्र के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शरद पवार की मुलाकात ने विपक्षी गठबंधन के भीतर मतभेद और परिसीमन बिल पर नया सियासी घमासान छेड़ दिया है.

Sharad Pawar Meets PM Modi: संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही देश की राजनीति में एक नया ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. एनसीपी (शरद पवार) के मुखिया शरद पवार की एक चाल ने पूरे विपक्षी खेमे की धड़कनें बढ़ा दी हैं. दरअसल, शरद पवार ने पहले जंतर-मंतर जाकर केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों और सोनम वांगचुक का समर्थन किया. लेकिन इसके ठीक बाद वे अचानक अपनी बेटी सुप्रिया सुले के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने पहुंच गए. इस एक मुलाकात ने विपक्षी गठबंधन में हड़कंप मचा दिया है.
विपक्षी दलों में अचानक क्यों बढ़ गई घबराहट?
कांग्रेस, सपा और उद्धव ठाकरे की शिवसेना जैसी पार्टियां इस समय केंद्र सरकार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोले हुए हैं. हाल ही में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन करते हुए हिरासत में भी लिए गए थे. ऐसे में जब पूरा विपक्ष सरकार पर हमलावर है, तब शरद पवार का पीएम मोदी से मिलना बाकी पार्टियों को पच नहीं रहा है. विपक्ष को डर है कि पवार के इस कदम से सरकार के खिलाफ उनकी सामूहिक लड़ाई कमजोर पड़ सकती है.
क्या परिसीमन बिल पर सरकार का साथ देंगे पवार?
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा प्रस्तावित डिलिमिटेशन (परिसीमन) बिल को लेकर हो रही है. माना जा रहा है कि संसद सत्र के दौरान पवार की पार्टी इस बिल पर केंद्र सरकार के रुख का समर्थन कर सकती है. अगर ऐसा होता है, तो इंडिया (INDIA) गठबंधन के भीतर की दरारें पूरी तरह खुलकर सामने आ जाएंगी. इसके अलावा महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर के बंद के आह्वान के बीच यह सियासी हलचल काफी अहम मानी जा रही है.
क्या है शरद पवार का असली गेम प्लान?
सियासी जानकारों का मानना है कि शरद पवार हमेशा से दबाव और संतुलन की राजनीति करते आए हैं. वे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के साथ अपने रिश्ते अच्छे रखना चाहते हैं ताकि उनकी सौदेबाजी की ताकत बनी रहे. दूसरा कारण यह भी है कि वे महाराष्ट्र के संसदीय और क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखकर व्यावहारिक फैसले लेते हैं. परिसीमन जैसे बड़े मुद्दे पर नरम रुख अपनाकर वे राज्य की सीटों और अपने राजनीतिक दबदबे को सुरक्षित करना चाहते हैं.
विपक्ष के लिए सेतु या सबसे बड़ा खतरा?
शरद पवार की गिनती देश के उन गिने-चुने नेताओं में होती है, जिनकी बात सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सुनते हैं. वे खुद को एक ऐसे वरिष्ठ नेता के रूप में पेश करते हैं जो जरूरत पड़ने पर दोनों धड़ों के बीच बातचीत की राह खोल सके. हालांकि पीएम मोदी से उनकी इस मुलाकात पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. लेकिन विपक्ष को यही चिंता सता रही है कि पवार की यह ‘दोहरी चाल’ गठबंधन को फायदे के बजाय भारी नुकसान न पहुंचा दे.
