राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी ने राजनीति में नए-नए आए ही थे, मां इंदिरा गांधी के कंधों को मजबूत करने का जिम्मा राजीव के कंधों पर था। जिस कांग्रेस ने देश पर सबसे लंबे समय तक राज किया, उन दिनों वो सत्ता से दूर हो चुकी थी। साल 1977 में पहली बार आजाद भारत में गैर कांग्रेसी सरकार बन चुकी थी, इंदिरा गांधी और कांग्रेस किसी भी कीमत पर सत्ता वापस पाना चाह रही थी। राजीव गांधी ने अपने पुराने दोस्तों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। इसी कड़ी में राजीव ने पंजाब में अपने स्कूल के एक दोस्त से कांग्रेस में शामिल होने की गुजारिश की। दोस्त का नाम था, कैप्टन अमरिंदर सिंह…। 1980 यही वो साल था, जब पहली बार राजीव ने अपने दोस्त पर भरोसा किया और लोकसभा चुनाव के लिए मैदान में उतार दिया। चार साल बाद ही साल 1984 में वो दोस्त कांग्रेस छोड़ देता है, वजह थी ऑपरेशन ब्लू स्टार। शिरोमणि अकाली दल को चुना, उसे छोड़ा, अपनी पार्टी बनाई और फिर कांग्रेस से जुड़ गए। 14 साल तक कांग्रेस से दूर रहने के बाद जब साल 1998 में वापसी हुई, तो राजीव गांधी दुनिया छोड़ चुके थे। उनकी पत्नी सोनिया गांधी कांग्रेस की सर्वेसर्वा थीं। कैप्टन अमरिंदर को राजीव से दोस्ती का तोहफा भी मिला, 2002 में जब कांग्रेस आई तो उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई। 5 साल बाद फिर सत्ता चली गई और उसके 10 साल बाद फिर वापसी हुई, फिर कैप्टन सीएम बने। इस बीच कैप्टन अमरिंदर सिंह का कद कांग्रेस में काफी ज्यादा ऊंचा हो चुका था। सोनिया और कांग्रेस के सबसे करीबी और राजदार नेताओं में उनका नाम गिना जाने लगा था। और फिर, जो हुआ सबने देखा… अब कैप्टन अमरिंदर सिंह बीजेपी के साथ हैं और वो पंजाब की सियासत के रग-रग से वाकिफ हैं। पंजाब में बीजेपी ऐसी चाल चलने वाली है, जिसकी भनक शायद सियासत के बड़े-बड़े महारथियों को नहीं होगी।
जिस तरीके से बीजेपी ने बिहार में लंबे संघर्ष के बाद सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बना दिया, जिस तरीके से बंगाल में जमीन से जुड़े और ममता-टीएमसी की नस-नस समझने वाले शुभेंदु अधिकारी को आगे किया और सीएम बना दिया, अब वही फॉर्मूला भारतीय जनता पार्टी पंजाब में आजमाने जा रही है, पंजाब में बीजेपी का तुरुप का इक्का अभी भी जिंदा है। उसका नाम है कैप्टन अमरिंदर सिंह। ये वही तुरुप का इक्का है जिसे बीजेपी ने पाल-पोस कर बड़ा किया है, लगातार पानी दिया है। ये वही कैप्टन हैं जिन्होंने 2022 में बीजेपी का दामन थामा था और ये वही कैप्टन हैं जिन्होंने पंजाब में सबसे मजबूत कांग्रेस को इतना कमजोर कर दिया कि कांग्रेस सत्ता से बाहर चली गई और आम आदमी पार्टी की सरकार बन गई। अब इसी तुरुप के इक्के का इस्तेमाल करके बीजेपी पंजाब की सियासत पलटने की तैयारी में है, साथ ही राघव चड्ढा को साथ लेते हुए मजबूती के साथ पंजाब में आगे बढ़ रही है और कैसे 2027 विधानसभा चुनाव में बीजेपी इसी कॉम्बिनेशन के साथ शानदार जीत दर्ज करने की प्लानिंग कर रही है। आइये समझते हैं…
क्या है कैप्टन अमरिंदर सिंह की मजबूती
पूर्व सैन्य अधिकारी की देशभक्त छवि, पटियाला के शाही परिवार से ताल्लुक और बेबाक नेतृत्व शैली, ऐसे कई गुण हैं जो पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब के कद्दावर नेताओं में शुमार करती है, कैप्टन पंजाब की राजनीति को बखूबी समझते हैं, क्योंकि वे पंजाब में कांग्रेस का मुख्य चेहरा रह चुके हैं। ग्रामीण सिख मतदाताओं और शहरी हिंदुओं, दोनों पर ही उनका प्रभाव है। जिसके दम पर ही उन्होंने दो बार 2002 और 2017 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, 2021 में कांग्रेस से अलग होने के बाद भले ही, उनकी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर रहा, लेकिन कैप्टन का नाम आज भी पंजाब की सियासत में वजन रखता है। बीजेपी को पता है कि, बिना सिख चेहरे के पंजाब फतह नहीं होगा सकता है।
पंजाब में बीजेपी को क्यों चाहिए कैप्टन?
वैसे तो बाजेपी पंजाब के शहरी क्षेत्रों में मजबूत रही है, हिंदू वोटर, व्यापारी वर्ग बीजेपी के साथ रहा है, लेकिन, लेकिन पार्टी को ग्रामीण सिखों के बीच पैठ बनाने के लिए अमरिंदर सिंह के नाम और चेहरे की सख्त जरूरत है, 2022 में किसान आंदोलन के बाद बीजेपी की ग्रामीण इलाकों में छवि कमजोर हुई थी, कैप्टन एक जाट सिख नेता हैं, फौजी बैकग्राउंड से आते हैं, राष्ट्रवाद की बात करते हैं। ये सारी चीजें बीजेपी के कोर एजेंडे से मैच करती हैं, हाल ही में बीजेपी के नए पंजाब अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने साफ किया है कि, 2027 के विधानसभा चुनावों में कैप्टन पार्टी के प्रचार का मुख्य चेहरा होंगे। यानी बीजेपी ने मन बना लिया है कि कैप्टन को आगे करके ही लड़ाई लड़ी जाएगी, पटियाला और उसके आस-पास के मालवा क्षेत्र की कुछ सीटों पर कैप्टन का आज भी सीधा प्रभाव है। पटियाला शहरी, पटियाला ग्रामीण, समाना, नाभा, राजपुरा… इन सीटों पर कैप्टन फैक्टर चलता है, इसके साथ ही पूरे पंजाब के जनाधार को अपने दम पर प्रभावित करने की क्षमता कैप्टन के अंदर है। 2017 में जब कैप्टन सीएम फेस थे, तब कांग्रेस ने 117 में से 77 सीटें जीती थीं। वो कैप्टन का ही करिश्मा था, हालांकि 2022 में कांग्रेस छोड़ने के बाद उनकी अपनी पार्टी सिर्फ 1 सीट जीत पाई, लेकिन तब हालात अलग थे। अब बीजेपी का संगठन, मोदी का चेहरा और कैप्टन का अनुभव… ये तिकड़ी पंजाब में खेल बदल सकती है।
क्या राघव चड्ढा बनेंगे दूसरा मोहरा?
बीजेपी आम आदमी पार्टी के युवा चेहरे राघव चड्ढा को भी साधने में लगी है। राघव पंजाबी हैं, पढ़े-लिखे हैं, युवाओं में पकड़ है, अगर कैप्टन अनुभव का चेहरा हैं, तो राघव युवा जोश का, आप सरकार की अंदरूनी कलह, दिल्ली शराब घोटाले में फंसते नेता, भगवंत मान सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी… इन सबका फायदा उठाने के लिए बीजेपी नए-पुराने चेहरों का कॉकटेल बना रही है, कैप्टन के पास कांग्रेस की कमजोर नसों की जानकारी है, राघव के पास आप की और बीजेपी के पास संगठन। ये तीनों मिल जाएं तो पंजाब में 2027 का गणित पलट सकता है।
क्या कैप्टन डैमेज कंट्रोल कर पाएंगे?
सबसे बड़ा सवाल… क्या कैप्टन अब भी उतने मजबूत हैं जितना कांग्रेस राज में थे? जवाब हां भी है और ना भी। हां इसलिए क्योंकि नाम आज भी बिकता है। फौजी छवि, राष्ट्रवादी बयान, सिद्धू को हराने वाला नेता… ये सब याद है लोगों को, ना इसलिए क्योंकि उम्र 80 पार है, स्वास्थ्य साथ नहीं देता, और 2022 की हार ने झटका दिया है, लेकिन बीजेपी को कैप्टन चाहिए चेहरे के लिए, वोट काटने के लिए नहीं, वोट जोड़ने के लिए, कैप्टन अगर मालवा की 20-25 सीटों पर भी असर डाल दें, और शहरी हिंदू वोट बीजेपी के साथ रहे, तो सरकार बन सकती है। पंजाब में त्रिकोणीय मुकाबला है, बीजेपी का फॉर्मूला साफ है। पुराने दिग्गज को तोड़ो, अपने पाले में लाओ, और उसके अनुभव से राज्य फतह करो, कैप्टन ने 2022 में कांग्रेस को तोड़ा, जिससे पंजाब में आप की सरकार बनी, अब 2027 में बीजेपी की सरकार बनवा सकते हैं। उनकी मजबूती है अनुभव, सिख चेहरा, फौजी पृष्ठभूमि और पटियाला का जनाधार, कमजोरी है उम्र और 2022 की हार, लेकिन बीजेपी को लड़ना नहीं, सिर्फ चेहरा चाहिए। ग्राउंड पर संगठन लड़ेगा, दिल्ली से मोदी लहर चलेगी, और पंजाब में कैप्टन का नाम चलेगा, केवल सिंह ढिल्लों पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि कैप्टन ही 2027 का चेहरा होंगे, अगर राघव चड्ढा जैसा युवा चेहरा भी साथ आ जाए तो बीजेपी का खेल बन जाएगा। कांग्रेस के पास पंजाब में अब कोई कैप्टन जैसा नेता नहीं है, आप के पास भगवंत मान हैं लेकिन इस बार एंटी-इनकंबेंसी भारी है, तो क्या 2027 में पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह बीजेपी के मुख्यमंत्री बनेंगे? संभावना पूरी है। तुरुप का इक्का फेंका जा चुका है, अब देखना है कि ये इक्का बाजी पलटता है या नहीं, इतना तय है कि पंजाब की पिच पर कैप्टन के बिना बीजेपी की जीत मुश्किल है। और कैप्टन के साथ जीत नामुमकिन नहीं है।
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