अयोध्या: राम मंदिर के चढ़ावे में सेंधमारी करने वाले गिरोह को लेकर पुलिस और एसआईटी (SIT) की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, मंदिर परिसर की आंतरिक सुरक्षा और प्रबंधन पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पूर्व में नोटों की गिनती (Calculation) के कार्य में शामिल रहे बैंक के एक पूर्व कैशियर ने एसआईटी के सामने सुरक्षा व्यवस्था में हुई बड़ी चूक का पर्दाफाश किया है.
‘किसी के कहने पर’ बदल दिए गए थे सख्त नियम
पूर्व कैशियर ने एसआईटी को बताया कि पहले मंदिर में चढ़ावे की रकम की गिनती के समय सुरक्षा के बेहद कड़े और पुख्ता इंतजाम हुआ करते थे. एसआईएस के सुरक्षाकर्मी हर एक कर्मी की विधिवत और सघन जांच करते थे. यहाँ तक कि गणना कार्य में बैठने वाले कर्मियों को अंदर जाने से पहले दूसरे विशेष कपड़े (ड्रेस) पहनाए जाते थे, ताकि कोई भी नोट छिपाकर बाहर न ले जा सके. लेकिन बाद में यह पूरी पारदर्शी व्यवस्था ‘किसी के प्रभाव या कहने पर’ अचानक बदल दी गई, जिससे चोरों को खुली छूट मिल गई.
टिन्नू यादव का नाम ही था ‘पासवर्ड’, वाकी-टाकी से होती थी मदद
खुलासे में यह बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई है कि गिरोह का मुख्य सदस्य रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू परिसर में इतना प्रभावशाली हो चुका था कि उसका नाम ही सुरक्षा घेरे को तोड़ने का पासवर्ड बन गया था. जांच में पता चला है कि कोई भी कर्मी सिर्फ ‘टिन्नू यादव’ का नाम ले लेता था, तो उसे परिसर में कहीं भी आने-जाने की अनुमति मिल जाती थी और कोई सुरक्षाकर्मी उन्हें नहीं रोकता था। टिन्नू के पास हर वक्त एक वाकी-टाकी रहता था, जिसकी मदद से वह किसी भी मुसीबत या जांच के वक्त अपने गुर्गों की मदद के लिए तुरंत पहुंच जाता था.
पहले कैसी होती थी सुरक्षा व्यवस्था? (जो बाद में ठप हो गई)
जांच में सामने आया है कि शुरुआत में चोरी रोकने के लिए एक बेहद मजबूत और बहुस्तरीय (Multi-layer) सुरक्षा ढांचा तैयार किया गया था, जिसके नियम इस प्रकार थे.
कड़ी तलाशी और जांच
मुख्य गेट पर तैनात पुलिस बल द्वारा सघन तलाशी ली जाती थी और हुंडी कार्यालय (चढ़ावा कक्ष) में दोबारा बारीकी से जांच होती थी.
निजी सामान पर पाबंदी
ड्यूटी पर आने वाले हर कर्मी को अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद अपना मोबाइल फोन और अन्य निजी सामान बाहर लॉकर में जमा करना होता था.
विशेष ड्रेस कोड
सभी के लिए विशेष रूप से तैयार की गई ड्रेस पहनना अनिवार्य था, जिसमें जेबें या नोट छिपाने की जगह नहीं होती थी.
सीसीटीवी और मिलान
एसआईएस (SIS) सुरक्षाकर्मी पहचान पत्र का पूरी तरह मिलान करके ही प्रवेश देते थे और यह पूरी प्रक्रिया 24 घंटे कैमरों की निगरानी में होती थी.
कंटेनर व्यवस्था
नोटों की गिनती पूरी होने के बाद ब्यौरे को रजिस्टर में दर्ज किया जाता था और वाउचर बनाकर रकम को लोहे के सुरक्षित कंटेनरों में बंद करके बैंक भेजा जाता था.
ये भी पढ़ें: UK Rain Alert: बागेश्वर में स्कूल बंद, उफान पर अलकनंदा! चमोली,बद्रीनाथ धाम समेत कई इलाकों में झमाझम बारिश का अलर्ट
