JP Morgan Global Food Crisis Warning: इस रिपोर्ट में जानिए कैसे उर्वरक की भारी किल्लत और अल नीनो का कहर 2027 तक दुनिया में वैश्विक खाद्य संकट और रिकॉर्डतोड़ महंगाई लाने वाला है.

JP Morgan Global Food Crisis Warning: दुनिया भर में खाने-पीने की चीजों को लेकर एक नया और बड़ा संकट मंडरा रहा है. वित्तीय सेवा संस्था जेपी मॉर्गन (JP Morgan) ने अपनी एक नई रिपोर्ट में पूरी दुनिया को सतर्क किया है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2027 तक वैश्विक स्तर पर भोजन का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है. इस संभावित संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया शामिल हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह दुनिया में चल रहे तनाव, खाद (उर्वरक) की भारी किल्लत और मौसम में आ रहे तेजी से बदलाव को माना जा रहा है.
2027 में बढ़ेगी महंगाई, आम जनता पर पड़ेगा सीधा असर
जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट बताती है कि यह संकट भोजन के पूरी तरह खत्म होने का नहीं है. असली समस्या खाद की बढ़ती कीमतों और फसल की कम पैदावार की वजह से पैदा होगी. इसका सीधा असर लोगों की जेब पर पड़ेगा और वैश्विक महंगाई बढ़ेगी. अनुमान है कि साल 2027 की पहली छमाही तक दुनिया में महंगाई दर बढ़कर करीब 5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. यह आंकड़ा साल 2026 की पहली छमाही में महज 2.8 प्रतिशत के आसपास दर्ज किया गया था. खाद्य पदार्थों के महंगे होने से गरीब और विकासशील देशों के परिवारों का बजट बुरी तरह गड़बड़ा सकता है.
संकट का पहला बड़ा विलेन: खाद और यूरिया की किल्लत
रिपोर्ट में बताया गया है कि इस खाद्य संकट के पीछे पहला सबसे बड़ा कारण उर्वरक की कमी है. मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) के देश दुनिया में करीब 42 फीसदी यूरिया और 27 फीसदी अमोनिया का निर्यात करते हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास चल रहे तनाव और प्राकृतिक गैस की आसमान छूती कीमतों ने इस सप्लाई चेन को रोक दिया है. यूरिया और नाइट्रोजन वाले उर्वरक फसलों की बुवाई के समय बहुत जरूरी होते हैं. अगर समय पर खाद न मिले तो फसलों का उत्पादन काफी घट जाता है, जिसे बाद में सुधारना नामुमकिन होता है.
संकट का दूसरा बड़ा विलेन: अल नीनो और मौसम की मार
उर्वरक की कमी के साथ-साथ मौसम का बिगड़ता मिजाज इस संकट को और गहरा बना रहा है. अल नीनो के कारण दुनिया के कई प्रमुख कृषि क्षेत्रों में बारिश और तापमान का पूरा चक्र बदल रहा है. इससे कई इलाकों में सूखा और कई जगह बिन मौसम भारी बारिश या बाढ़ जैसे हालात बन रहे हैं. इतिहास गवाह है कि अल नीनो की वजह से उष्णकटिबंधीय इलाकों में फसलों के उत्पादन में औसतन 3.5 प्रतिशत तक की गिरावट आ जाती है. इसके चलते दुनिया भर में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 1.3 से 1.5 फीसदी तक का उछाल आ सकता है.
भारत में किन फसलों पर मंडराएगा सबसे बड़ा खतरा?
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह दोहरी चिंता का विषय है. मानसून में अनिश्चितता या देरी होने से देश में धान, दालें, तिलहन, गन्ना और कपास जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है. अगर खेतों में उत्पादन घटेगा, तो बाजारों में अनाज और सब्जियों की आवक कम हो जाएगी. आपूर्ति घटने से थोक कीमतें बढ़ेंगी और आखिरकार आम उपभोक्ताओं को खुदरा बाजार में ज्यादा दाम चुकाने पड़ेंगे. भारत के पास अनाज का सुरक्षित भंडार तो है, लेकिन किसानों के लिए खेती की बढ़ती लागत को संभालना सबसे बड़ी चुनौती होगा.
युद्ध से लेकर थाली तक, ऐसे फैलेगा यह खाद्य संकट
विशेषज्ञों ने इस पूरे संकट को समझने के लिए एक सीधा सा चक्र तैयार किया है. इसकी शुरुआत भू-राजनीतिक युद्धों और तनाव से होती है, जिससे सबसे पहले ऊर्जा और गैस का संकट गहराता है. इसके बाद रासायनिक खाद और उर्वरक का उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है. लागत बढ़ने पर किसान खाद का कम इस्तेमाल करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप फसलों की पैदावार घट जाती है. आखिर में बाजार में अनाज की कमी होती है और आम आदमी की थाली तक पहुँचते-पहुँचते भोजन बेहद महंगा हो जाता है.
