Allahabad High court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर से जुड़ी एक जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था पर चिंता जताई है और बेहद कड़ी टिप्पणी की है. जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि Court मामलों में होने वाली देरी के लिए केवल न्यायिक अधिकारी जिम्मेदार नहीं हैं. कोर्ट ने साफ किया कि राज्य सरकार, पुलिस तंत्र और कमजोर जांच प्रणाली इस देरी के बड़े कारण हैं.
दामिनी के डॉयलॉग का जिक्र
हाईकोर्ट ने फिल्म दामिनी के डॉयलॉग का जिक्र करते हुए टिप्पणी की. हाईकोर्ट ने कहा अदालतों पर लगा तारीख पर तारीख का दाग तब तक नहीं हटेगा जब तक सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली नहीं सुधरेगी. फतेहपुर के मेवालाल की जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने उक्त टिप्पणी की. हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि प्रशासनिक खामियों के चलते मुकदमे लंबित हैं. अध्ययन का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट में पेशकार, आशुलिपिक और अन्य कर्मचारियों की बड़ी कमी है. ऐसे में एक- एक लिपिक हजारों फाइलों का बोझ संभाल रहा है. वहीं पुलिस अदालती समन और वारंट समय से तामील कराने में विफल है. गवाहों और पुलिस अधिकारियों का अदालत में पेश न होना भी देरी का बड़ा कारण है. इसके साथ ही पुलिस द्वारा अदालती प्रक्रियाओं का सही पालन न करना और फॉरेंसिक रिपोर्ट मिलने में होने वाली देरी न्याय की गति को धीमा कर देती है.
जानिए क्या था मुख्य मामला?
दरअसल आवेदक मेवालाल प्रजापति ने फतेहपुर के हुसेनगंज थाने में दर्ज मामले में खुद को जमानत पर रिहा करने की इलाहाबाद हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी. उसके खिलाफ हत्या समेत कई संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था. कोर्ट में आवेदक के वकील की तरफ से कहा गया कि आवेदक 19 अक्टूबर 2025 से जेल में बंद है. जमानत पर रिहा होने के बाद वो ट्रायल में पूरी तरीके से सहयोग करेगा. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि आवेदक के पास से खून से सना एक स्क्रू ड्राइवर भी बरामद किया गया था जिसे FSL जांच के लिए भेजा गया और FSL रिपोर्ट के अनुसार उस पर इंसान का खून पाया गया, लेकिन जांच अधिकारी यह साबित करने के लिए डीएनए जांच रिपोर्ट पेश नहीं कर सका कि वह खून मृतक का ही था.
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