Kenya airport deal: केन्या ने दो साल पहले भारत के अदाणी समूह के जिस एयरपोर्ट आधुनिकीकरण प्रोजेक्ट का भारी विरोध के बाद नामंजूर किया था, अब उसे ही चीनी कंपनी को सौंप दिया है.

Kenya airport deal: केन्या की राजधानी नैरोबी में मौजूद जोमो केन्याटा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के आधुनिकीकरण का फैसला आजकल पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है. ये पूरा मामला अब सिर्फ एक एयरपोर्ट बनाने या सुधारने तक सीमित नहीं रह गया है. ये घटनाक्रम वैश्विक राजनीति, बड़ी कंपनियों की आपसी होड़ और अंतरराष्ट्रीय दबाव का एक बहुत बड़ा उदाहरण बन चुका है.
दिलचस्प बात ये है कि जिस बड़े प्रोजेक्ट को करीब दो साल पहले भारत के अडानी ग्रुप को सौंपने की पूरी तैयारी चल रही थी, आज उसी एयरपोर्ट के विकास के लिए एक चीनी कंपनी के साथ बहुत बड़ी और महंगी डील फाइनल कर ली गई है. इस अचानक आए बदलाव से यह गंभीर सवाल उठने लगा है कि क्या यह केन्या का अपनी मर्जी से लिया गया आर्थिक फैसला था या फिर इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का कोई खेल चल रहा था.
अडानी ग्रुप ने 2024 में रखा था प्रस्ताव
अगर हम थोड़ा पीछे जाकर देखें तो साल 2024 में भारत के बिजनेस हाउस अडानी ग्रुप ने इस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आधुनिकीकरण के लिए एक बड़ा निवेश प्रस्ताव केन्या सरकार के सामने रखा था. इस योजना का मुख्य उद्देश्य प्राइवेट पैसे के दम पर एयरपोर्ट का विस्तार करना और इसे दुनिया के बेहतरीन हवाई अड्डों की कतार में खड़ा करना था.
लेकिन जैसे ही इस भारतीय कंपनी के प्रस्ताव की बात जनता के बीच पहुंची, वहां अचानक इसके खिलाफ एक बड़ा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. केन्या के भीतर सरकारी संपत्तियों को प्राइवेट हाथों में सौंपने और पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दों को लेकर एक बड़ा अभियान छेड़ दिया गया. वहां के मजदूर संगठनों, विपक्षी राजनीतिक दलों और आम नागरिकों के कुछ समूहों ने इसे देश के स्वाभिमान और राष्ट्रीय हित के खिलाफ बताया, जिसके बाद सरकार ने घुटने टेक दिए और प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.
चीनी कंपनी को हरी झंडी
इस विवाद के ठीक दो साल बाद आज केन्या की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. अब उसी सबसे महत्वपूर्ण एयरपोर्ट को चमकाने की जिम्मेदारी चीन की सरकार द्वारा समर्थित कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी को सौंप दी गई है. केन्या सरकार ने इस चीनी कंपनी के साथ लगभग 3 अरब डॉलर यानी एक बहुत भारी भरकम बजट वाले प्रोजेक्ट को अपनी हरी झंडी दे दी है.
चौंकाने वाली बात यह है कि इस चीनी प्रोजेक्ट की कुल लागत दो साल पहले प्रस्तावित भारतीय अदाणी मॉडल से बहुत ज्यादा है. अब ऐसे में यह सवाल उठना बिल्कुल लाजिमी है कि अगर केन्या के लोगों को विदेशी कंपनियों के दखल से इतनी ही परेशानी थी, तो अब वह चिंता अचानक कहां गायब हो गई. इसके साथ ही यह भी सोचने वाली बात है कि अगर देश का फायदा ही सबसे ऊपर था, तो फिर ज्यादा पैसे खर्च करके किसी दूसरी विदेशी कंपनी को काम देने का क्या तुक बनता है.
इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए हमें अफ्रीका महाद्वीप में चीन के बढ़ते दबदबे को अच्छी तरह समझना होगा. पिछले लगभग बीस सालों से चीन ने अफ्रीका के अलग अलग देशों में सड़कों, समुद्री बंदरगाहों, रेलवे लाइनों और हवाई अड्डों का जाल बिछाकर अपना गहरा प्रभाव बना लिया है.
कर्ज के जाल में फंसाने का है प्लान
चीन की नीतियों पर नजर रखने वाले जानकारों का हमेशा से ये आरोप रहा है कि चीन बड़े बड़े लोन पैकेज और सरकारी मदद का लालच देता है. वह इन गरीब या विकासशील देशों की स्थानीय राजनीतिक व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेता है और फिर वहां के जरूरी प्रोजेक्ट्स पर सालों के लिए कब्जा जमा लेता है. अफ्रीका के कई देशों में चीनी कर्ज की शर्तों को छुपा कर रखने और उन देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसाने की खबरें समय समय पर दुनिया के सामने आती रही हैं.
दूसरी तरफ अगर भारत की बात करें तो पिछले कुछ सालों में भारत की प्राइवेट कंपनियों ने पूरी दुनिया में इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी के क्षेत्र में बहुत तेजी से अपनी धाक जमाई है. अदाणी समूह जैसे बड़े भारतीय उद्योगों का इस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैर पसारना कई वैश्विक ताकतों और उनके पुराने प्रतिस्पर्धियों को बिल्कुल रास नहीं आ रहा है.
भारत को हटाने में अंतरराष्ट्रीय साजिश
यही वजह है कि केन्या के इस घटनाक्रम को एक अलग नजरिए से भी देखा जा रहा है. लोग अब यह सवाल भी पूछ रहे हैं कि क्या हवाई अड्डे के प्रोजेक्ट के खिलाफ हुआ वह भारी विरोध प्रदर्शन सिर्फ वहां के स्थानीय लोगों की अपनी चिंता का नतीजा था, या फिर भारत को वहां से हटाने के लिए पर्दे के पीछे से कोई अंतरराष्ट्रीय साजिश और चीन की बड़ी कूटनीति काम कर रही थी.
आंख बंद करके नहीं कर सकते हैं भरोसा
हालांकि इस बेहद संवेदनशील विषय पर अभी तक कोई भी ऐसा पक्का या लिखित सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह सीधे साबित हो सके कि विरोध प्रदर्शनों के पीछे किसी बाहरी देश का हाथ था. इसलिए बिना किसी ठोस प्रमाण के ऐसे बड़े दावों पर आंख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता और इन्हें सावधानी से देखने की जरूरत है.
लेकिन इन सब बातों के बीच इस कड़वे सच से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि केन्या में जिस विदेशी कंपनी के आने का पुरजोर विरोध किया गया था, उसकी विदाई के बाद जगह एक दूसरी विदेशी कंपनी ने ही ली. सबसे बड़ा पेंच यह है कि नई कंपनी को काम देने के लिए केन्या को अब पहले से कहीं ज्यादा मोटी रकम अपनी जेब से चुकानी पड़ रही है.
इस पूरे ड्रामे का जो सबसे बड़ा और नुकसानदेह पहलू है, वो पूरी तरह से आर्थिक है. राजनीति और जनता की भावनाओं के दबाव में आकर लिए गए फैसलों की असल कीमत हमेशा देश की आम जनता और टैक्स भरने वाले लोगों को ही चुकानी पड़ती है. लोकतांत्रिक देशों में अक्सर यह देखा जाता है कि नेता तुरंत की लोक लुभावन वाहवाही लूटने के चक्कर में देश के लंबे समय के आर्थिक फायदों को नजरअंदाज कर देते हैं.
केन्या का यह पूरा मामला इसी बड़ी राजनीतिक चुनौती को दुनिया के सामने लाता है. आज केन्या के सामने केवल एक एयरपोर्ट खड़ा करने की चुनौती नहीं है, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक जिद और भू राजनीतिक होड़ के चक्कर में उसने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है और एक आर्थिक रूप से नुकसानदेह रास्ता चुन लिया है.
