Asif ali zardari hindu remark: इस स्टोरी में जानिए स्वतंत्रता दिवस पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा हिंदू अल्पसंख्यकों को लेकर दिए गए विवादित बयान, झूठे आंकड़ों और उस पर शुरू हुए अंतरराष्ट्रीय घमासान के बारे में.

Asif ali zardari hindu remark: पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने देश के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अल्पसंख्यक हिंदुओं को लेकर एक बेहद विवादित बयान दिया है, जिससे नया अंतरराष्ट्रीय विवाद पैदा हो गया है। जरदारी का कहना है कि पाकिस्तान और वहां के मुसलमान 3 से 4 प्रतिशत हिंदू आबादी को ‘बर्दाश्त’ कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने भारत के ‘अखंड भारत’ के विचार पर भी निशाना साधा। देश के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा हिंदू अल्पसंख्यकों के लिए ‘बर्दाश्त’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किए जाने से भारत और दुनिया भर में उनकी कड़ी आलोचना हो रही है।
आंकड़ों में जरदारी का बड़ा दावा और हकीकत
राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने भाषण के दौरान दावा किया कि पाकिस्तान में हिंदुओं की कुल आबादी 3 से 4 प्रतिशत के आसपास है। हालांकि, अगर पाकिस्तान की हालिया 2023 की आधिकारिक जनगणना पर नजर डालें, तो हकीकत कुछ और ही बयां करती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदुओं की कुल आबादी करीब 52 लाख है, जो देश की पूरी जनसंख्या का महज 2.17 प्रतिशत है। जरदारी ने जमीनी सच्चाई से इतर आंकड़े बढ़ा चढ़ाकर पेश किए और इस गलत आंकड़े का सहारा लेकर अपने विवादित बयान को सही ठहराने की नाकाम कोशिश की।
‘बर्दाश्त’ शब्द पर क्यों मचा हंगामा
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जरदारी ने कहा कि वे मुसलमान हैं और अल्पसंख्यक हिंदू उनसे अलग हैं, लेकिन उनकी सोच ऐसी है कि वे अपने देश में 3 से 4 प्रतिशत हिंदुओं को सहते या बर्दाश्त करते हैं। हालांकि अपने इस बयान के तुरंत बाद उन्होंने दावा ठोक दिया कि पाकिस्तान में हिंदू पूरी तरह सुरक्षित और आजाद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू भारत के बजाय पाकिस्तान में रहना ज्यादा पसंद करते हैं। लेकिन देश के संवैधानिक प्रमुख की जुबान से ‘बर्दाश्त’ जैसा शब्द निकलना उनकी असल संकीर्ण मानसिकता को उजागर करता है।
स्वतंत्रता दिवस के मंच का गलत इस्तेमाल
जरदारी ने यह भड़काऊ भाषण इस्लामाबाद स्थित ‘यादगार ए फतह’ विजय स्मारक के एक कार्यक्रम के दौरान दिया। यह स्मारक पाकिस्तान ने भारत के साथ हुए 2025 के संघर्ष की याद में बनाया है, जिसे वह ‘मारका ए हक’ नाम देकर खुद की जीत के रूप में भुनाता रहा है। पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस जैसे बड़े और ऐतिहासिक अवसर पर भी राष्ट्रपति का पूरा ध्यान भारत के खिलाफ नफरत फैलाने पर ही केंद्रित रहा। राष्ट्रीय उत्सव के मंच का इस्तेमाल इस तरह से भारत विरोधी एजेंडे को हवा देने और विभाजनकारी सोच को बढ़ावा देने के लिए किया गया, जिससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और ज्यादा बढ़ने के आसार नजर आ रहे हैं।
भारतीय जानकारों ने जताई सख्त आपत्ति
पाकिस्तान के राष्ट्रपति के इस बयान पर भारत में बेहद तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। भारत के कई कानूनी जानकारों और शोधकर्ताओं ने उनके इस बयान की कड़े शब्दों में निंदा की है। विश्लेषकों का मानना है कि आजादी के आठ दशक बीत जाने के बाद भी पाकिस्तानी हुक्मरान अपनी पुरानी और विभाजनकारी सोच से बाहर नहीं आ पाए हैं। वे आज भी अपने घरेलू संकटों और आर्थिक बदहाली से अपनी जनता का ध्यान भटकाने के लिए भारत और हिंदू अल्पसंख्यकों का नाम ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं। दुनिया भर के मंचों पर अब इस बयान को लेकर पाकिस्तान के रवैये पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का कड़वा सच
कागजी तौर पर पाकिस्तान का संविधान अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और धार्मिक आजादी देने का वादा करता है, लेकिन धरातल पर सच्चाई बेहद खौफनाक है। पाकिस्तान में इस्लाम को राज्य धर्म का दर्जा प्राप्त होने के कारण आए दिन अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार की खबरें आती रहती हैं। वहां हिंदू और ईसाई समुदाय के लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन कराना, लड़कियों का अपहरण करना और भीड़ द्वारा हिंसा होना बेहद आम बात बन चुकी है। ऐसे बदतर माहौल के बीच राष्ट्रपति जरदारी द्वारा ‘बर्दाश्त’ शब्द का प्रयोग करना वहां के अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति पर मुहर लगाता है और यह साबित करता है कि वहां अल्पसंख्यकों के अधिकार सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं।
