Ram Mandir donation theft: अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद ट्रस्ट और मंदिर प्रबंधन में बड़े बदलावों का दौर जारी है. चंपत राय, डॉ. अनिल मिश्रा और गोपाल राव के दायित्वों में बदलाव के बाद अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ पदाधिकारी भैया जी जोशी को भी राम मंदिर के ‘पालक’ (संरक्षक) पद की जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने की जानकारी सामने आई है. संघ द्वारा नियुक्त राम मंदिर के ‘पालक’ को पदमुक्त किए जाने की कार्रवाई को अब सीधे चढ़ावा चोरी प्रकरण और चंपत राय के इस्तीफे से जोड़कर देखा जा रहा है.
नए नाम पर मंथन शुरू
सूत्रों के मुताबिक, संगठन की ओर से राम मंदिर के लिए नए पालक की नियुक्ति को लेकर मंथन शुरू हो गया है. इसके लिए संघ और मंदिर प्रबंधन से जुड़े कई वरिष्ठ एवं प्रभावशाली नामों पर विचार किया जा रहा है. माना जा रहा है कि जल्द ही किसी नए कद्दावर चेहरे को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है. राम मंदिर में चढ़ावे के प्रबंधन और उससे जुड़े विवादों के बाद प्रशासनिक एवं संगठनात्मक स्तर पर लगातार बदलाव किए जा रहे हैं। इसी क्रम में मंदिर की व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है.हालांकि, भैया जी जोशी को पालक पद से मुक्त किए जाने को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। ऐसे में अंतिम पुष्टि संबंधित संगठन या ट्रस्ट की आधिकारिक घोषणा के बाद ही हो सकेगी.
चंपत राय के ‘लेटर बम’ से हड़कंप
6 जुलाई को ट्रस्ट की बैठक में चंपत राय का इस्तीफा मंजूर किए जाने की घोषणा की गई थी. इसके ठीक अगले ही दिन, 7 जुलाई को चंपत राय ने एक लेटर जारी कर बड़ा धमाका कर दिया. इस पत्र के जरिए उन्होंने चढ़ावा गिनती के अनुबंध (Contract) से जुड़ी गुप्त जानकारियां सोशल मीडिया पर उजागर कर दी थीं. चंपत राय ने अपने पत्र में तीखे तेवर दिखाते हुए लिखा था: “फिलहाल मैं शांत हूं, लेकिन एसआईटी (SIT) जांच पूरी होने के बाद हर एक सवाल का कड़ा जवाब दूंगा। मैं अपने ऊपर कोई कलंक लेकर नहीं जाने वाला।”
शीर्ष नेतृत्व में चिंता, संतों के जरिए साधी गई चुप्पी
चंपत राय के इस आक्रामक रुख और खुले ऐलान से संगठन का शीर्ष नेतृत्व बुरी तरह चिंतित हो उठा था. नेतृत्व को डर था कि इस बयानबाजी से कोई नया बड़ा विवाद खड़ा न हो जाए. इसी के चलते उन्हें शांत करने और मनाने के लिए बैकचैनल बातचीत शुरू की गई. बाद में अयोध्या के प्रमुख संतों को उनके समर्थन में उतारकर चंपत राय को दिलासा देने और स्थिति को संभालने का प्रयास किया गया.
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