Rare earth permanent magnets india: भारत में 7,280 करोड़ रुपये की योजना से रेयर अर्थ चुंबक के निर्माण के लिए 20 कंपनियों ने दांव लगाया है.

Rare earth permanent magnets india: आने वाले समय में इलेक्ट्रिक कारों से लेकर मोबाइल फोन और विंड टर्बाइन की मांग बहुत तेजी से बढ़ने वाली है. इन सभी आधुनिक सामानों को बनाने के लिए कुछ खास खनिजों की जरूरत होती है. इन्हीं में से एक है रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट, जो बहुत ताकतवर चुंबक होते हैं. फिलहाल भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर ऐसा चुंबक दूसरे देशों से आयात करता है. इस निर्भरता को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार ने देश में ही इनके निर्माण की एक बड़ी योजना तैयार की है. सरकार का अनुमान है कि 2030 तक भारत में इन चुंबकों की सालाना मांग बढ़कर 8,220 मीट्रिक टन तक पहुंच जाएगी.
7,280 करोड़ रुपये की योजना का पूरा गणित
सरकार ने घरेलू स्तर पर इन खास चुंबकों का निर्माण बढ़ाने के लिए 7,280 करोड़ रुपये की मेगा योजना को मंजूरी दी है. इस योजना का मकसद देश में सालाना 6,000 मीट्रिक टन क्षमता का पूरा मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करना है. इसका मतलब यह है कि भारत में सिर्फ चुंबक नहीं जोड़े जाएंगे, बल्कि कच्चे माल से लेकर तैयार चुंबक बनाने की पूरी प्रक्रिया यहीं होगी. योजना के तहत 750 करोड़ रुपये की कैपिटल सब्सिडी और 6,450 करोड़ रुपये का सेल्स लिंक्ड इंसेंटिव रखा गया है. इसके लिए मार्च 2026 में ग्लोबल टेंडर जारी किया गया था.
5 कंपनियों का चयन और 20 दावेदार
इस बड़े प्रोजेक्ट के लिए सरकार कुल 5 कंपनियों को चुनेगी. इस टेंडर के लिए बाजार की 20 बड़ी कंपनियों ने अपनी बोलियां लगाई हैं. चुनी गई हर कंपनी को सालाना 600 से 1,200 मीट्रिक टन चुंबक बनाने की क्षमता दी जाएगी. कंपनियों की ओर से तकनीकी बोलियां जुलाई 2026 के अंत तक ली जा चुकी हैं. सरकार की कोशिश है कि देश में रेयर अर्थ ऑक्साइड से मेटल, मेटल से एलॉय और फिर तैयार मैग्नेट बनाने का काम बिना किसी रुकावट के भारत के अंदर ही पूरा किया जा सके.
4 राज्यों में बनेंगे विशेष प्रोसेसिंग पार्क
चुंबक निर्माण के साथ-साथ सरकार क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग पर भी खास ध्यान दे रही है. इसके लिए आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और ओडिशा में विशेष प्रोसेसिंग पार्क बनाए जाएंगे. नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन के तहत इन पार्कों के लिए 500 करोड़ रुपये तय किए गए हैं. इन पार्कों का मुख्य उद्देश्य विदेश से आने वाले या देश में मिलने वाले कच्चे खनिजों को भारत में ही रिफाइन करना है. ओडिशा के पार्क में खनिजों की रिसाइक्लिंग पर भी विशेष काम किया जाएगा ताकि कच्चे माल की कोई कमी न रहे.
चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति
दुनिया भर में इन खास खनिजों और चुंबक की सप्लाई चेन पर फिलहाल चीन का दबदबा है. भारत के पास रेयर अर्थ खनिजों के भंडार तो हैं, लेकिन उन्हें हाई-टेक चुंबक में बदलने की आधुनिक तकनीक और प्लांट नहीं थे. इसी वजह से भारत को एनडीएफईबी (NdFeB) जैसे जरूरी चुंबक बाहर से मंगाने पड़ते थे. सरकार अब इसी कमी को दूर करना चाहती है. देश में ही प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता तैयार होने से भारत का विदेशी बाजारों पर निर्भर रहना काफी हद तक कम हो जाएगा.
आम जनता और देश को क्या होगा फायदा
इस पूरी पहल का फायदा लंबे समय में देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों को मिलेगा. भारत में ही चुंबक बनने से इलेक्ट्रिक गाड़ियों की लागत घटेगी और सप्लाई चेन मजबूत होगी. इसके अलावा मोबाइल, लैपटॉप, विंड टर्बाइन और डिफेंस सेक्टर के उपकरणों को समय पर सामान मिल सकेगा. एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र के लिए यह कदम रणनीतिक रूप से बहुत सुरक्षित है. किसी भी वैश्विक संकट या तनाव के समय भारत में बनने वाले ये चुंबक हमारी सुरक्षा और जरूरतों के लिए एक मजबूत ढाल का काम करेंगे.
