बंगाल की सियासत में सबसे बड़ा सियासी धमाका होने वाला है। ममता के हाथ उनके विधायक और सांसद तो पहले ही निकल चुके हैं और अब उनको अपने पार्टी से भी हाथ धोना पड़ सकता है, टीएमसी के दो टुकड़े तो हो ही चुक हैं, टीएमसी के बागी सांसद ने ये भी कह दिया है कि, ममता की नहीं, टीएमसी हमारी है, हम हैं असली टीएमसी, तो अब क्या टीएमसी का जो सिंबल है वो भी ममता बनर्जी से छीन लिया जाएगा? क्योंकि टीएमसी के बागी सांसदों के नेता सुदीप बंदोपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार और जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर असली टीएमसी हमारी होने का दावा किया है, इसके लिए बागी सांसदों का दल अदालत में भी जाएगा और अगर ऐसा होता है तो टीएमसी के दो टुकड़े हो जाएंगे और ममता दीदी की मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी, वैसे इससे पहले भी ऐसा कई पार्टियों के साथ हो चुका है जहां पार्टी के दो टुकड़े हो गए। आइए देखते हैं द ट्रुथ 24 की इस खास रिपोर्ट में…

भारत में पार्टी टूटने का इतिहास
भारत में राजनीतिक पार्टियों में टूट और असली पार्टी पर दावे की लड़ाई का इतिहास काफी पुराना है, 1969 में कांग्रेस के ऐतिहासिक विभाजन से लेकर हाल के सालों में शिवसेना और राकांपा तक, भारत के कई राज्यों में ऐसी ही बगावत और दो राजनीतिक पार्टियों के दो फाड़ देखने को मिले हैं।
शिवसेना और एनसीपी
महाराष्ट्र ने हाल के सालों में देश के सबसे बड़े राजनीतिक विभाजन देखे हैं।
शिवसेना- एकनाथ शिंदे ने जून 2022 में 39 विधायकों के साथ उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी, शिंदे गुट ने दावा किया कि वही असली शिवसेना हैं, चुनाव आयोग ने फरवरी 2023 में शिंदे गुट को असली शिवसेना माना और पार्टी का धनुष बाण चुनाव चिह्न उन्हें सौंप दिया।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी- जुलाई 2023 में अजीत पवार ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत की और 41 विधायकों के साथ भाजपा शिंदे सरकार में शामिल हो गए। फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने अजीत पवार गुट को असली एनसीपी घोषित करते हुए घड़ी चुनाव चिह्न उन्हें दे दिया।
एलजेपी और जदयू का इतिहास
लोक जनशक्ति पार्टी LJP 2021: रामविलास पासवान के निधन के बाद जून 2021 में पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। रामविलास के भाई पशुपति कुमार पारस ने 5 अन्य सांसदों के साथ मिलकर चिराग पासवान को संसदीय दल के नेता पद से हटा दिया और असली पार्टी होने का दावा किया। चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अलग अलग नाम और चुनाव चिह्न जारी किए।
जनता दल JD- मूल जनता दल कई बार विभाजित हुआ। 1999 में शरद यादव और लालू प्रसाद यादव के मतभेदों के कारण पार्टी विभाजित हुई, जिससे जदयू और राजद जैसी नई पार्टियां ने जन्म लिया।
AIADMK में दो बार हो चुकी है टूट
तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के भीतर दो बार बड़ी टूट हुई है। पहली टूट 1987 में एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद हुआ जब पार्टी उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन और जे जयललिता के दो गुटों में बंट गई, बाद में जयललिता ने बहुमत साबित कर पार्टी पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया, दूसरा विभाजन 2017 से 2022 के बीच हुआ। जयललिता के निधन के बाद पार्टी ओ पनीरसेल्वम और ई के पलानीस्वामी के गुटों में बंटी। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद EPS गुट को पार्टी के सर्वोच्च पद पर मान्यता मिली।
तेलुगु देशम पार्टी में भी हो चुकी है टूट
1995 में आंध्र प्रदेश में एक बहुत ही फेमस तख्तापलट हुआ जब एन चंद्रबाबू नायडू ने अपने ससुर और पार्टी संस्थापक एनटी रामा राव के खिलाफ बगावत कर दी। नायडू ने अधिकांश विधायकों का समर्थन हासिल कर NTR को मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया। चुनाव आयोग और अदालत ने बहुमत के आधार पर नायडू गुट को ही असली टीडीपी स्वीकार किया।
चुनाव आयोग कैसे करता है फैसला
जब भी किसी पार्टी में दो फाड़ होता है और दोनों गुट असली पार्टी होने का दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग सिंबल ऑर्डर 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत इसका फैसला करता है। आयोग मुख्य रूप से दो टेस्ट अपनाता है।
1. संगठनात्मक बहुमत- पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, पदाधिकारियों और परिषद में किस गुट के पास ज्यादा सदस्य हैं।
2. विधायी बहुमत- संसद लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं में किस गुट के पास कितने निर्वाचित सांसद और विधायक हैं।
आज के राजनीतिक दौर में विधायकों, सांसदों की संख्या ही सबसे निर्णायक साबित होता है, शिवसेना और एनसीपी के मामले में भी चुनाव आयोग ने बहुमत के आधार पर ही फैसला दिया था।
टीएमसी में बगावत अब खुलकर सामने आ गई है, सुदीप बंदोपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार और जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया का गुट लोकसभा अध्यक्ष से मिल चुका है, अदालत जाने की तैयारी है। अगर इनके पास दो तिहाई सांसदों का समर्थन मिल गया तो ममता बनर्जी के लिए पार्टी बचाना मुश्किल हो जाएगा, इतिहास गवाह है कि जब भी किसी पार्टी में विधायी बहुमत बागी गुट के पास गया है, चुनाव आयोग ने उसी को असली पार्टी माना है। शिवसेना में उद्धव ठाकरे के पास भावना थी, लेकिन विधायक शिंदे के पास थे। नतीजा, धनुष बाण शिंदे को मिला। एनसीपी में शरद पवार संस्थापक थे, लेकिन विधायक अजीत के पास थे। घड़ी अजीत को मिली, ममता बनर्जी के सामने अब वही चुनौती है। ऑपरेशन लोटस के बाद से टीएमसी के कई सांसद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अभिषेक बनर्जी को आगे बढ़ाने से पुराने नेता नाराज हैं। बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद सत्ता का केंद्र बदल गया है, अगर बागी गुट चुनाव आयोग में साबित कर देता है कि उनके पास संगठन और संसद दोनों में बहुमत है, तो टीएमसी का फूल और घास वाला सिंबल ममता से छिन सकता है। पार्टी का नाम भी जा सकता है, ऐसे में ममता बनर्जी के लिए ये सबसे बड़ी सियासी लड़ाई है। 1998 में कांग्रेस तोड़कर टीएमसी बनाई थी। 26 साल बाद अब खुद की बनाई पार्टी हाथ से निकल सकती है। बंगाल की शेरनी के लिए अगला कुछ महीना करो या मरो वाला होगा.
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