Hamas Disarmament Gaza: चार दशक के संघर्ष के बाद हमास ने गाजा से इज़रायली सेना की वापसी और स्थायी युद्धविराम की शर्तों पर पहली बार अपने हथियार जमा करने के संकेत दिए हैं.

Hamas Disarmament Gaza: करीब चार दशक से अपनी सैन्य ताकत के दम पर लड़ने वाला लड़ाका संगठन हमास अब अपने तेवर ढीले करता दिख रहा है. इतिहास में पहली बार हमास ने इशारा किया है कि अगर उसकी कुछ बड़ी शर्तें मान ली जाएं, तो वह अपने हथियार छोड़ने पर बात करने को तैयार है. इस खबर ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है, क्योंकि इससे गाजा में जारी खूनी जंग के थमने की नई उम्मीद जगी है. हालांकि हमास ने साफ कर दिया है कि वह बिना शर्त हथियार नहीं डालेगा. उसकी मांग है कि इजरायल गाजा से अपनी पूरी सेना हटाए, जंग पर हमेशा के लिए पूर्णविराम लगे और आजाद फिलिस्तीन देश बनाने का पक्का रास्ता साफ किया जाए.
1987 के बाद पहली बार बदला हमास का रुख
साल 1987 में बने हमास की पूरी पहचान ही इजरायल के खिलाफ सशस्त्र लड़ाई से रही है. इतने सालों में उसने कभी हथियार रखने की बात नहीं की, इसलिए उसका यह नया रुख काफी हैरान करने वाला माना जा रहा है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इसे हमास की एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल भी मान रहे हैं. दो साल से जारी भारी जंग में हमास को बड़ा नुकसान हुआ है. उसके कई बड़े कमांडर मारे जा चुके हैं और गाजा का पूरा ढांचा तबाह हो चुका है. ऐसे में हमास बातचीत की टेबल पर अपनी शर्तें रखकर अपने वजूद को बचाने की कोशिश में लगा है.
डोनाल्ड ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्लान चर्चा में
हमास का यह नया बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से पेश किए गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्लान के बीच आया है. इस शांति योजना में गाजा को लेकर एक रोडमैप तैयार किया गया है. इसके तहत इजरायल को चरणबद्ध तरीके से अपनी सेना गाजा से हटानी होगी, वहीं हमास को भी धीरे-धीरे अपने हथियार जमा कराने होंगे. इसके बाद गाजा में अंतरराष्ट्रीय शांति सेना तैनात की जाएगी और एक अंतरिम फिलिस्तीनी प्रशासन का गठन किया जाएगा. फिर जाकर गाजा के पुनर्निर्माण का काम शुरू होगा, ताकि आम जनता को राहत मिल सके.
क्या इजरायल मानेगा हमास की शर्तें?
हमास के इस रुख के बाद अब पूरी गेंद इजरायल के पाले में है. इजरायल शुरुआत से ही कहता आ रहा है कि हमास के पूरी तरह निरस्त्रीकरण के बिना युद्ध खत्म नहीं होगा. लेकिन अब हमास की शर्तों पर भरोसा करना इजरायली सरकार के लिए आसान नहीं है. इजरायल के भीतर इस बात को लेकर भारी असमंजस है कि क्या हमास सच में अपने सारे हथियार सरेंडर कर देगा. पूर्व राजनयिकों का दावा है कि तेल अवीव इस अमेरिकी प्रस्ताव से बहुत खुश नहीं है. यही वजह है कि पिछले 48 घंटों में गाजा पर इजरायल की तरफ से हमले और तेज हो गए हैं.
नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ीं
यह पूरा घटनाक्रम इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है. इजरायल में अक्टूबर में चुनाव होने वाले हैं और नेतन्याहू अपनी जनता को यह भरोसा नहीं दिला पा रहे हैं कि युद्ध से उन्हें क्या हासिल हुआ. ईरान के साथ हालिया तनाव में भी इजरायल को वैसी सफलता नहीं मिली जैसी उम्मीद थी. अब अगर अमेरिका के दबाव में इजरायल को हमास की शर्तों पर समझौता करना पड़ता है, तो नेतन्याहू के लिए अपनी ही देश की जनता का सामना करना मुश्किल हो जाएगा. इसलिए इजरायल इस समझौते पर कई पेंच फंसा सकता है.
गाजा के भविष्य पर सबसे बड़ा पेंच
अगर यह समझौता किसी तरह लागू हो भी जाता है, तो भी सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि गाजा की सत्ता किसके हाथ में जाएगी. योजना के मुताबिक शुरुआत में एक अंतरराष्ट्रीय बोर्ड की देखरेख में अंतरिम सरकार बनेगी. बाद में चुनाव कराए जाएंगे और गाजा तथा वेस्ट बैंक को एक ही शासन तंत्र के तहत लाने का प्लान है. लेकिन दोनों पक्षों के बीच भरोसे की इतनी भारी कमी है कि बिना अंतरराष्ट्रीय गारंटी के एक कदम भी आगे बढ़ना नामुमकिन दिखता है. फिर भी, पहली बार जंगबंदी से आगे बढ़कर गाजा के स्थायी भविष्य और राजनीतिक समाधान पर बात शुरू होना एक बहुत बड़ा बदलाव है.
