थैलेसीमिया बच्चों के अंदर जन्म से ही होने वाली बीमारी है. आज के समय भारत में बड़ी संख्या में बच्चे इस बीमारी की चपेट में है. भारत उन देशों में से है, जहां इसके केस सबसे ज्यादा देखने को मिलते हैं. इसके केस हर साल घटने की बजाए और बढ़ते हुए दिखाई देते हैं. यह बीमारी बच्चों में तब होती है, जब अल्फा ग्लोबिन जीन खराब हो जाते हैं.
थैलेसीमिया क्या होता है?
हालांकि, अभी तक आपको समझ आ गया होगा कि यह ब्लड से जुड़ी दिक्कत है. दरअसल, यह तब होता हैं जब हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन ढंग से नहीं बन पाता हैं. हीमोग्लोबिन हमारे पूरे शरीर में ऑक्सीजन का लेकर जाता है. पूरे शरीर में ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन से बाइंड होकर जाता है. यह एक प्रकार का प्रोटीन है. जो रेड ब्लड सेल्स में मौजूद होता है और हमारे शरीर की गतिविधियों के लिए जरूरी होता है.
हर महीने जाना पड़ता था इन प्रोसेस से
थैलेसीमिया के रोगियों को हर माह ब्लड ट्रांसफ्यूजन के लिए अस्पताल जाना पड़ता है. यह प्रक्रिया काफी दर्दनाक है लेकिन हाल ही में मिली जानकारी के अनुसार अब थैलेसीमिया के मरीजों को इस कठिन प्रक्रिया से नहीं जाना होगा.
क्या है नया तरीका?
बता दें कि यह तरीका काफी आसान है. इसमें आपको किसी भी प्रकार की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा बल्कि आपको केवल एक गोली दी जाएंगी. इस खाने वाली दवा को अमेरिकी खाद्य और औषधि प्रशासन द्वारा ग्रीन सिग्नल दिया जा चुका है. इस दवा का नाम मिटापिवैट है. इस ओरल ड्रग को एक्वासिम नाम से बेका जाएगा. अल्फा और बीटा दोनों थैलेसीमिया के मरीजों के लिए यह कारगर साबित होगी.
कैसे काम करती है दवा?
यह दवा शरीर के अंदर मौजूद रेड ब्लड सेल्स को मजबूती देती है और सभी सेल्स में एनर्जी ट्रांसफर करती है. इस दवा के कारण लाल रक्त कोशिकाएं यानी रेड ब्लड सेल्स जल्दी खत्म नहीं हो पाते हैं, जिससे हीमोग्लोबिन का स्तर अपने आप शरीर में बढ़ जाता है.
भारत में कितने मरीज थैलेसीमिया के
यह बीमारी भारत, अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों में सबसे ज्यादा देखने को मिलती है. जारी आंकड़ों के अनुसार हर साल 10 से 12 हजार के करीब बच्चे इस बीमारी के साथ पैदा होते हैं. यह तस्वीर काफी चौंकाने वाली है.
इस बीमारी के कारण लोगों की शारीरिक बनावट और रंग रूप बाकी लोगों से अलग देखने को मिलते हैं. इन बच्चों के चेहरे काफी ज्यादा थके, हड्डियों के ढांचे में बदलाव और शरीर का रंग पीला देखने में लगता है. इन बच्चों में एनीमिया होना काफी आम होता है.
