Donald trump on israel iran war: डोनाल्ड ट्रंप ने शांति वार्ताओं के बीच इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर अचानक महाहमला कर पूरी दुनिया को चौंका दिया है. इस ‘जंगी छलावे’ के जरिए अमेरिका ने अब सीधे ईरान की सत्ता और IRGC को निशाने पर ले लिया है, जिससे मिडिल ईस्ट में सत्ता परिवर्तन का खतरा बढ़ गया है.

Donald trump on israel iran war: शनिवार सुबह तेहरान के आसमान में काला धुआं छा गया. सायरन गूंजने लगे. पहले खबर आई कि इजरायल ने पहले से तैयारी के तहत हमला किया है. कुछ देर बाद डोनाल्ड ट्रंप सामने आए और वीडियो संदेश में कहा कि यह कार्रवाई ईरान की इस्लामिक सत्ता और उसकी फौज इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के खिलाफ है. उन्होंने साफ कहा कि अब मकसद केवल परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं है. बल्कि ईरान की सत्ता पर दबाव बनाना है. और आईआरजीसी से सरेंडर की मांग भी की गई है. ईरान के दर्जन भर शहरों में मिसाइल हमले हुए. यह हालात जून 2025 में हुए 12 दिन के युद्ध जैसे ही नजर आए. फर्क सिर्फ तारीख का है. तब भी शांति की बातें हो रही थीं. और तभी अचानक बम बरसने लगे थे.
जून 2025 में ओमान में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते पर बातचीत चल रही थी. माहौल सकारात्मक बताया जा रहा था. अब वही तस्वीर फिर बनी. इस बार बातचीत जिनेवा में चल रही थी. ईरान के विदेश मंत्री पहले ही कह चुके थे कि वे परमाणु मुद्दे पर बातचीत को तैयार हैं. लेकिन हमला होने पर जवाब भी देंगे. इसी बीच इजरायल और अमेरिका ने तेहरान समेत कई शहरों पर मिसाइलें दाग दीं. कुछ घंटे पहले ही अमेरिकी मीडिया से बात करते हुए ओमान के विदेश मंत्री कह चुके थे कि दोनों देश समझौते के करीब हैं. यानी शांति की उम्मीद बनी हुई थी. और उसी समय जंग शुरू हो गई.
इस पूरे सैन्य अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के दफ्तर के पास भी धमाके हुए. ईरान के कई इलाकों में मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गईं. पूरे देश का हवाई क्षेत्र सील कर दिया गया. वहीं इज़रायल में अस्पतालों को बंकरों में शिफ्ट किया गया. इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका और इज़रायल ने उस सत्ता पर हमला किया है जो उनके अस्तित्व को मिटाना चाहती है. इससे पहले जून 2025 के हमले पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा था कि ट्रंप उस कार्रवाई से खुश नहीं थे. लेकिन इस बार खुद ट्रंप ने सामने आकर ऑपरेशन की घोषणा की.
स्ट्रैटेजिक मामलों के जानकार माइकल नाइट्स जो वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट से जुड़े हैं. उनका कहना है कि इजरायल अमेरिका के लिए फ्रंटलाइन देश है. और इस बार उसे व्हाइट हाउस में बेहद भरोसेमंद साझेदार मिला है. उधर ईरान पहले ही कह चुका था कि अगर हमला हुआ तो क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकाने उसके वैध निशाने होंगे. जून 2025 में उसकी मिसाइलें तेल अवीव तक पहुंची थीं. और खाड़ी में अमेरिकी बेस भी निशाने पर आए थे. अब ईरान चाहता है कि जरूरत पड़ी तो लेबनान का हिज़्बुल्लाह और यमन के हूती भी उसका साथ दें. ताकि दबाव और बढ़ाया जा सके.
विशेषज्ञ मानते हैं कि अब तीन रास्ते दिख रहे हैं. पहला रास्ता सीमित हमलों का है. जिसमें सिर्फ परमाणु और मिसाइल ठिकाने निशाने पर रहेंगे. फिर बातचीत शुरू होगी. दूसरा रास्ता लंबी जंग का है. जिसमें प्रॉक्सी लड़ाई तेज होगी. और स्ट्रेट ऑफ होरमुज बंद होने का खतरा भी बनेगा. तीसरा रास्ता सत्ता बदलने की कोशिश का है. इस पर अटलांटिक काउंसिल के विलियम वेचसलर मानते हैं कि यह सबसे खतरनाक विकल्प होगा. क्योंकि ईरान की सेना कमजोर नहीं है. अंदरूनी विरोध जरूर है. लेकिन सत्ता अभी मजबूत है. इस बार जंग का दायरा बड़ा है. और अगर जल्दी सीजफायर नहीं हुआ. तो यह सिर्फ ईरान और इज़रायल की लड़ाई नहीं रहेगी. बल्कि पूरे पश्चिम एशिया और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ेगा.
