afghanistan pakistan border clash: तालिबान के सैन्य प्रमुख फसीहुद्दीन फितरत की अगुवाई में अफगानिस्तान ने पाकिस्तान के खिलाफ बड़ी जवाबी कार्रवाई करते हुए 19 चौकियों पर कब्जा कर लिया है और 55 सैनिकों को ढेर कर दिया है. डूरंड लाइन पर बढ़ते इस तनाव ने दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है.

afghanistan pakistan border clash: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पर अचानक तनाव बहुत बढ़ गया है. शुक्रवार तड़के पाकिस्तान की ओर से काबुल समेत अफगानिस्तान के दो इलाकों पर हमला किया गया. इसके बाद अफगानिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की. अफगान पक्ष का दावा है कि सीमा पर 55 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. इसके साथ ही अफगान लड़ाकों ने डूरंड लाइन के पास पाकिस्तानी सेना के दो ठिकाने और कुल 19 पोस्ट पर कब्जा कर लिया. अब पाकिस्तान के सीमावर्ती शहर भी निशाने पर बताए जा रहे हैं. इस पूरी रणनीति के पीछे जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है. वह हैं तालिबान के सैन्य प्रमुख मोहम्मद फसीहुद्दीन फितरत. कहा जा रहा है कि मौजूदा कार्रवाई उन्हीं की योजना का नतीजा है.
फसीहुद्दीन फितरत इस समय तालिबान के सबसे ताकतवर सैन्य नेताओं में गिने जाते हैं. साल 2021 से वे अफगान सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ हैं. वे ताजिक समुदाय से आते हैं. संगठन के भीतर उनकी पहचान एक सख्त और रणनीतिक कमांडर की है. तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद उनका कद और बढ़ गया. उत्तरी अफगानिस्तान में हुई कई बड़ी सैन्य सफलताओं का श्रेय उन्हें दिया जाता है. इसी वजह से आज सीमा पर हो रही लड़ाई में भी उनका नाम सबसे आगे लिया जा रहा है.
फितरत का जन्म बदख्शां प्रांत के वारदुज इलाके में हुआ था. वे दरी भाषा बोलने वाले ताजिक परिवार से हैं. उनके पिता मौलवी सैफुद्दीन धार्मिक विद्वान थे. बचपन से ही उनका माहौल धार्मिक रहा. उन्होंने एक मदरसे से पढ़ाई की. कुछ समय तक वे स्थानीय स्कूल में शिक्षक भी रहे. बाद में वे इस्लामी पढ़ाई के लिए कराची गए. वहीं से उनका रुझान पूरी तरह तालिबान की ओर हो गया. देश में चल रहे संघर्ष ने उनके जीवन की दिशा बदल दी.
नब्बे के दशक के आखिर में वे तालिबान में शामिल हो गए. उस दौर में तालिबान तेजी से फैल रहा था. उत्तरी इलाकों में उसने नॉर्दर्न अलायंस के प्रभाव को कमजोर करने में अहम भूमिका निभाई. साल 2001 के बाद उन्हें बदख्शां का शैडो गवर्नर बनाया गया. साल 2013 में वे तालिबान के सैन्य आयोग के प्रमुख बने. साल 2015 में उनकी मौत की खबर फैली. बाद में यह अफवाह निकली. इसके बाद संगठन में उनकी ताकत और बढ़ गई.
साल 2021 में पूरे देश पर दोबारा कब्जे की मुहिम के दौरान उन्होंने पंजशीर प्रांत में अभियान की कमान संभाली. इसी अभियान के बाद उन्हें “फतह-ए-शुमाल” यानी उत्तर का विजेता कहा जाने लगा. साल 2022 में उन्होंने बाल्खाब इलाके में हुए विद्रोह को भी कुचल दिया. इसके अलावा उन्होंने ISIS-K के खिलाफ कई सैन्य अभियान चलाए. आज वे तालिबान सरकार के सबसे प्रभावशाली सैन्य चेहरों में शामिल हैं. बदख्शां के एक मदरसे के छात्र से लेकर पूरे देश की सैन्य रणनीति संभालने तक का उनका सफर आज की अफगान राजनीति की तस्वीर दिखाता है.
